अब सोचते हैं लाएँगे तुझ सा कहाँ से हम, शायरी और गीत के अनोखेपन का नाम है मजरूह सुल्तानपुरी

साहित्य डेस्क, NH

आइए सुनते हैं ‘कालिया’ फिल्म का गीत ‘तुम साथ हो’ जिसके बोल लिखें हैं मजरूह सुल्तानपुरी ने…..’

रेडियो की ये आवाज हमें बचपन में खूब सुनाई पड़ती थी। धीरे-धीरे वक्त का पहिया आगे बढ़ा और रेडियो लोगों के हाथों से दूर चला गया उसकी जगह ले ली मोबाइल फोन ने लेकिन मजरूह सुल्तानपुरी के गीतों और उनके शख्सियत आज भी वैसे ही बरकरार हैं.
मजरूह वैसे तो पैदा आजमगढ़ में हुए थे लेकिन उनकी पुश्तैनी जमीन जायदाद सुल्तानपुर में थी। अंग्रेजी हुकूमत में पुलिस विभाग में कार्यरत पिता मजरूह को अंग्रेजीदां नहीं बनाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने उन्हें मदरसे में पढ़ने को भेजा। मदरसे से अरबी और फारसी की तालीम लेने के बाद मजरूह यूनानी चिकित्सा पद्धति सीखने लखनऊ चले गए। लखनऊ से हकीम बनकर लौटे मजरूह सुल्तानपुरी हकीमी में कुछ खास नहीं कर पाए लेकिन एक बार सुल्तानपुर के किसी मुशायरे में मजरूह सुल्तानपुरी ने एक ग़ज़ल सुनाइए जिस पर वहां मौजूद लोगों ने और कई शायरों ने भी खूब हौसलाबख़्शा। इस संयोग ने एक नाकाम हकीम को शायर बनने के लिए प्रेरित किया। यहीं से शुरू हुआ असरार उल हसन खान से मजरूह सुल्तानपुरी बनने का सफ़र।

एक मुशायरे में मज़रूह सुल्तानपुरी । साभार: विकिपीडिया

इस अदबी सफ़र में उनके गुरु मेंटर मार्गदर्शक और मित्र बने हैं जिगर मुरादाबादी। लोग बताते हैं कि एक बार मजरूह मुंबई के किसी मुशायरे में शामिल होने गए थे। वहां पर मशहूर फिल्म प्रोड्यूसर ए आर कारदार भी पहुंचे थे। जो मजरूह की शायरी से इतने प्रभावित हुए हैं कि मुशायरा खत्म होने के बाद उनसे फिल्मों में काम के लिए अर्जी लगा दी। लेकिन उस दौर में अदबी लोग सिनेमा जगत को में काम करने को बहुत अच्छा नहीं मानते थे। मजरूह साहब ने भी कारदार साहब के प्रस्ताव को मना कर दिया लेकिन तभी उनके मित्र और उस्ताद जिगर मुरादाबादी ने समझाया कि फिल्म में नाम भी है, पैसा भी है और अपने ऊपर है कि आपका कैसा काम करते हैं। मजरूह को यह बात जम गई और फिर वही से शुरू हुआ उन तमाम गीतों का दौर जो आरडी बर्मन से शुरू होकर नए दौर के एआर रहमान और लेस्ली लेविस के के धुनों में पिरोये जाते हैं।

बाएं से दाएं: नौशाद, लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी और मजरूह सुल्तानपुरी। साभार : ट्विटर (@FilmHistoryPic)

मजरूह को सिर्फ इसलिए याद रखा जाना कि वे हिंदी सिनेजगत की एक बड़े गीतकार हैं या फिर उनके गानों के बोल या कोई लाइन हमारे असल जिंदगी में बड़ा फिट बैठ जाती है या फिर हम बातचीत में उन्हें जब-तब कोट कर देते हैं, शायद नाकाफ़ी होगा। उन्हें को इसलिए भी याद किया जाना चाहिए कि मजरूह सुल्तानपुरी एक ऐसे शायर थे जिन्होंने देश के तरक्कीपसंद लोगों का साथ दिया।
एक किस्सा है कि एक बार उन्होंने कुछ कह दिया और बात सरकार को लग गई। मजरूह पर मुकदमा हो गया। उनसे कहा गया कि या तो माफी मांगो या जेल चले जाओ। उन्होंने माफी मांगने से साफ इनकार कर दिया और उन्हें दो साल के लिए जेल भेज दिया गया। उनकी पहली बेटी इसी वक्त पैदा हुई और परिवार आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा था। तब राज कपूर ने मजरूह का लिखा ‘दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई’ खरीदा और परिवार को इसके ऐवज में उस वक्त हजार रुपये दिए।
1 अक्टूबर 1919 से शुरू हुए इस शायर की जिंदगी की सफर पर उस दिन हमेशा के लिए ब्रेक लग गया जब 24 मई 2020 को उन्हें न्यूमोनिया का अटैक हुआ। मजरूह सुल्तानपुरी हमेशा किसी ना किसी बहाने याद किए जाते रहेंगे। कभी दिल लगाने के वास्ते, तो कभी समाज की खाईयों को मिटाने के वास्ते, तो कभी मानवता पर लगी आग बुझाने के वास्ते।

अब सोचते हैं लाएँगे तुझ सा कहाँ से हम
उठने को उठ तो आए तिरे आस्ताँ से हम

 

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