अमझरिया बनी कीर्त्तन की जन्म स्थली कीर्तन नगर

NH DESK JHARKHAND

विनीत कुमार खलारी /डकरा (रांची)

आनंद मार्ग के तत्वधान में शनिवार को चंदवा स्थित अमझरिया कीर्तननगर में 24 घंटा का बाबा नाम केवलम अखंड कीर्तन का समापन किया गया। जिसमें दूर-दूर से आनंद मार्गीयो ने भाग लिया ।लगभग 5000 की संख्या में आए आनंदमार्गीयों के रहने ,खाने सहित अन्य सुविधाओं की समुचित व्यवस्था संस्था की ओर से गई थी ।विदित हो कि राँची से 60 किलोमीटर दूर डाल्टनगंज रोड पर स्थित अमझरिया वन विभाग विश्रामागार के प्राँगण मे 8 अक्टूबर, सन् 1970 को बाबा नाम केवलम अष्टाक्षरी सिद्ध महा
मन्त्र कीर्तन का प्रवर्तत किया गया था। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आनंद मार्ग के वरिष्ठ आचार्य संपूर्णानंद अवधूत ने कहा कीर्तन अध्यात्म के साथ अभिन्न भाव से सम्बद्ध है। बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में श्री श्री आनन्दमूर्ति जी का आविर्भाव एक महान् एतिहासिक घटना है। जब मानव जीवन के रन्ध-रन्ध्र में भाव जड़ता ने प्रवेश कर मानव मन के सम्पूर्ण रस-माधुर्य को तिलचट्टे की तरह चाट लिया था, तब इस विषम परिस्थिति को समझ कर परम गुरु ने बीसवीं सदी के मध्य में आनन्द मार्ग संस्था की स्थापना की। दिगभ्रमित मानव को ज्ञानालोक से आलोकित किया। उन्होंने वर्तमान परिवेश, मानव मनोविज्ञान, शारीरिक संरचना, एवं सुदूर भविष्य को देख कर अष्टांग योग की साधना को नये सन्दर्भ में देना शुरू किया।

उन्होंने कहा साधक बाह्य परिवेश के कारण दिगभ्रमित न हो, इस कारण विभिन्न अवसरों पर उन्होंने धर्म, दर्शन, समाज शास्त्र, अर्थशास्त्र, राज्नीति शास्त्र साहित्य, कला, विज्ञान आदि से सम्बन्धित मौलिक ज्ञान की चर्चा प्रारम्भ की तथा एक सम्पूर्ण अध्यात्म दर्शन, दर्शनाधारित धर्मशास्त्र, समाज दर्शन, कुण्डलिनी योग एवं तन्त्र साधना को नये सिरे से प्रतिपादित एवं प्रवर्तित किया। आनन्द मार्ग के प्रारम्भिक दिनों में ज्ञान की खूब चर्चा हुई थी।

कार्यक्रम के दौरान आचार्य सविता नाम अवधूत ने कीर्तन दिवस के अवसर पर बताते हुए कहा साठ के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में उत्साही युवकों के एक दल ने मार्ग के आदर्श को दिग-दिगन्त में प्रचारित करने के उद्देश्य से पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में अपने को समर्पित किया। सेवा से समर्पित साधकगण विद्यालय, महाविद्यालय, शिशुसदन, आभा सेवा सदन आदि खोलने लगे। चारों ओर त्राण एवं राहत कार्य अपने जोर पर था। सर्वज्ञ अन्तर्यामी मार्ग गुरु ने देखा कि साधक गण समाज सेवा मे दिन-रात जड़ जगत् के सम्पर्क में रह कर जड़-जगत् की ही चर्चा किया करते हैं। इससे दुष्प्रभावित हो कर साधकों का मन कही जडात्मक न हो जाए। इसलिए साधकों की साधना मे ऊर्ध्व गति देने के.लिए तथा समाज मे व्याप्त कीर्तन को नये सिरे से व्यवस्थित व वैधानिक रूप देने की आवश्यकता से कीर्तन का प्रवर्तत विभिन्न राग रागिनियों के साथ किया। परमपूज्य बाबा ने इस पर विस्तृत चर्चा करके कीर्तन के महात्म्य को बताया था। कार्यक्रम को आचार्य गुणिदरानंद अवधूत ,आचार्य प्रज्ञानंद अवधूत, आचार्य सिद्धार्थानंद अवधूत ,आचार्य जगदानंद अवधूत ,अवधूतिका आनंदसर्वज्ञा आचार्या ने भी संबोधित किया। धन्यवाद ज्ञापन सुरेश दादा ने किया मौके पर पंचू दादा ,दुबराज दादा, गणेश दादा ,बुधनाथ दादा, दशरथ दादा ,दीनानाथ ,विजय कुमार सिंह ,उमेश प्रसाद ,जतरु प्रजापति, बबीता देवी ,मंजू देवी आदि लोग मौजूद थे।

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