आज हिंदी दिवस के शुभ अवसर पर पंडित डॉ विद्यानंद झा से मुख्य बिंदुओं पर चर्चा |

जिला संवाददाता नवेंदु कुमार मिश्रा

 

भारतीय संस्कृति का मूल आधार है सर्वेभवंतु सुखिन: और हिंदी का संकल्प हैनिजभाषा उन्नति अहै सब उन्नति के मूल ‘    हमारी संस्कृति सहयोग,सद्भाव, परस्पर मेल तथा सौहार्द पर आधारित है। इसका उत्स ही गंगा की तरह पावन, मनभावन और सदा सुहावन है। क्योंकि मानवता के कल्याण के लिए समर्पित यह संस्कार जीवन को जितना यशस्वी बनाता है हमारे कार्य व्यवहार को उतना ही बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय बनाता है। हमारी संस्कृति उदार और अनुकरणीय है। इसने अपने आदि काल से अद्यतन रूप में समाज का हित, मानवता का कल्याण तथा राष्ट्र का अतिशय मंगल ही किया हैं। तुलसीदास के शब्दों में हम चाहें तो कह सकते हैंहमारी पावन संस्कृतिमंगल भवन अमंगलहारी है। ‘इसने हमारी एकता और राष्ट्रीयता को सदा ही सबल और सम्पुष्ट बनाया है। अपनापनभाईचारा और  एकोअहम बहुस्यामि  की सोच इसी के शीतल छांव में पनपी है। यह वह संस्कृति है जहाँ संस्कारों का पुनर्निर्माण, चिंतन का परिष्कार तथा कर्मों का विस्तार,आपसी सहयोग और मेलमिलाप से होता हैं।  तो इसने अहम को स्वीकार किया है, ही इसने तिरस्कार को आत्मसात किया है।‘ जब बोलो तब मीठी बोल  यह हमारा सुविचार है  आगत का सत्कार तथा शरणागत की सुरक्षा , हमारी भारतीय संस्कृति की सर्व स्वीकृत उद्घोषणा हैं। परहित के लिए जीवन का अर्पण को इसने इतना सार्थक माना है कि संस्कृति के चार अध्याय में प्रेम, सद्भाव, सहयोग तथा समर्पण का विशेष महत्व है। जीवंत धारा के रूप में हमारी संस्कृति ने सदा ही सद्गुणों को अपनाने का सार्थक प्रयास किया है। भारत में समयसमय पर अनेक संस्कृतियों का गमनआगमन होता रहा है। 

हमारी संस्कृति ने सदा सद्गुणों या सत्संस्कारों को सहजता से अपनाया हैं। यही कारण है कि आज भारतीय संस्कृति आत्मिक भाव से भुवन व्यापिनी बनकर विश्वसंस्कृति बनने की स्थिति में तत्पर हैं।

 

 इसके लिए मात्र एक ही सूत्र सक्षम आधार है

 

” परोपकाराय पुण्याय पापय पर पीङ्नम् इसे कुछ लोगों ने आर्षवाणी भी कहा है। लेकिन सही में यह विचार भारतीय संस्कृति का प्राणाधार है।

तभी तो जियो और जीने दो हमारा उद्घोष है और सेवा परमोधर्म हमारा सांस्कृतिक संकल्प।

सच कहा जाय तो जो हमारी संस्कृति है वही हमारी हिंदी की सहज प्रकृति है। हिंदी हमारे मन की अभिलाषा है। यही हमारे उद्गार की जीवंत धारा है, विचारों की संवाहिका और चिंतन की प्रवाहिका है। हम इसी के माध्यम से अपने विचारों को अभिव्यक्त करते हैं। देश की अधिकांश आबादी इसे ही सहजता से बोलती, समझती और जानती है। इसका एक सुदृढ़ इतिहास है। इस इतिहास ने एक विश्वास को जन्म दिया है। देश की एकता को सबलता प्रदान करने में इसका विशेष महत्व है। वेद की ऋचायें, कुरान की आयतें, गुरु ग्रंथ साहब के शबद, बाइबल की प्रार्थनाएं, बुद्ध के विचार और महावीर के मंत्र जब तक जन जन हितकारी और मन मन प्रभावकारी नहीं बनते तब तक इसे हिंदी का पुलक स्पर्श या सहयोग नहीं मिलता। भाषा विज्ञान की शब्दावली में यह स्पष्ट किया गया है की संपूर्ण आर्यावर्त के लिए हिंदी विशाल वट वृक्ष है जिसकी जड़ है संस्कृत तथा अन्य भारतीय भाषायें, उपभाषायें बोलियां, इसकी विभिन्न डालियाँ  की संज्ञा दी गई हैं कारण हिंदी की जिजीविषा संस्कृति सापेक्षय हैं। इसकी सरलता, सहजता और सरसता इसकी आंतरिक शक्ति है तथा ग्रहणक्षमता इसकी एकल पहचान हैं। विश्व भाषा परिवार में हिंदी ही एक मात्र भाषा है जो यथा लेखन तथा वाचन के सिद्धांत पर लिखीबोली जाती हैं। यही एकमात्र पहचान है। साथ ही साथ इसमें आत्मसात करने की अद्भुत शक्ति है। इसकी शब्द संपदा विश्व की किसी समर्थ भाषा से उत्तम तथा श्रेष्ठ है। कारण अन्य भाषाओं के शब्दों को हिंदी बड़ी सरलता से आत्मसात कर अपना बना लेती है, कभी की क्षीण धारा समय के साथ बढ़तेचलते बहतेबहते आज सागर समान अथाह और अनंत शब्द सामथर्य के रूप में विद्यमान हैं। हिंदी में शब्दों की समरूपता कितनी भिन्न तथा बहुरूपी है कि देखते ही मन हर्षित हो जाता हैं। अंग्रेजी का नियर शब्द जो कबीर की एक दोहे मेंनिंदक नियरे राखिये—-” में प्रकट होता है तो अर्थ स्वत: गूंजने लगता हैं। मात्र स्वीकार करने की क्षमता और दक्षता हिंदी में नहीं है अपितु अपने शब्दों से भिन्न भाषाओं को भी सुसज्जित करने की दिव्यता हैं। तभी तो सबने एक स्वर से हिंदी के लाठी शब्द को  “लाठीचार्ज”  के साथ जग विदित बना दिया। यही नहीं हिंदी सहयात्री भाषाओं के लिए  संजीविनी हैं। आज अनेक भाषाओं, उपभाषाओं और बोलियों के शब्द विनष्ट होने के कगार पर आकर सिसक रहे हैं। उनका उपयोग बंद हो रहा हैं। वैसे भी मात्र भारत में लगभग 250 उपभाषायें बोलियां विलुप्त होने वाली हैं। ऐसी स्थिति में हिंदी का उदार हृदय इतना विशाल और सर्व मनभावक है कि ऐसे शब्दों को सहजता से स्वीकार कर जहाँ एक ओर इनके अस्तित्व को बनाए रखने में सक्षम हैं वहीं दूसरी ओर अपने भंडार को भरने के लिए सदा बढ़चढ़कर जीवित हैं। यह हिंदी की उदारता ही कही जायेगी। इसी उदार भाव के चलते आज हिंदी देश  की संस्कृति और सभ्यता की संवाहिका बन बैठी हैं। आज हिंदी के इसी उदार प्रवृत्ति और सुखद प्रकृति ने देश की एकता को सबल बनाया हैं। हिंदी आज केवल बोलचाल की भाषा नहीं अपितु राष्ट्रीय अस्मिता, संस्कार और संवाद की भाषा बन गई हैं। पूरा देश चाहे वह किसी भाषाभाषी का ज्ञाता हो हिंदी को सादर स्वीकार कर यह उद्घाटित करना चाहता है  कि हम सभी भारतीय हैं, सभी एक है, सभी राष्ट्र के लिये समर्पित हैं तिरंगा हमारा शान है और हिंदी हमारी पहचान है। इसी पहचान से भारत भाषित हैं। भारत की आत्मा हिंदी से गौरवान्वित है, हिंदी हमारी वीणा के तार तथा विचार का आधार है। इसके ही सफल संयोजन से हर जाति, धर्म ,भाव ,भाषा, विचार तथा प्रांत का व्यक्ति अपनी भिन्नता को मिटाकर एक बनकर सदा नेक कार्य हेतु अग्रसर हैं। यही हिंदी का समन्वित और प्रशंसित रूप है जिसके चलते हमारी संस्कृति का विस्तार अबाध रूप से हो रहा तथा हमारा देश ज्ञान, विज्ञान, अनुमान तथा अभिमान के पथ पर आगे बढ़ता जा रहा हैं। अतः ऐसी सशक्त, सक्षम तथा सार्थक हिंदी को माथे की बिंदी मानकर खुले मन से स्वीकार करना हर भारतीय का मंगल कर्म तथा सुखद धर्म ही कहा जाएगा, हम तो यही चाहेंगे -” हमारे संस्कृति के द्वार हिंदी का सत्कार होना ही चाहिए।

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