आनंद मार्ग के साधकों द्वारा प्रभात संगीत दिवस मनाया गया

NH DESK JHARKHAND

जलेश्वर कुमार महतो.एनएच- 24

रांची:
आनंद मार्ग आनंद मार्ग के साधकों द्वारा मोहराबादी मैदान,गुरुनिवास हेहल मधु मंजूषा एवं हेसल स्थित आनन्द मार्ग जागृति में 14 सितंबर मंगलवार को प्रातः 6:00 से 10:00 तक प्रभात संगीत दिवस मनाया गया। इस पावन अवसर पर एम के डांस एकेडमी एवं संकल्प सेंटर ऑफ परफॉर्मिंग 40 से अधिक कलाकारों ने प्रोफेसर मृणाल पाठक के निर्देशन में भावभीनी प्रभात संगीत का गायन कर वातावरण को मधुमय बना दिया।
विदित है कि भक्त वृन्द के बीच गीत-संगीत का विशेष महत्व है। आनन्द मार्ग के प्रवर्तक भगवान श्रीश्री आनंदमूर्ति ने 39 वर्ष पूर्व 14 सितंबर 1982 को देवघर झारखंड में प्रथम प्रभात संगीत “बंधु हे निये चलो” बांग्ला भाषा में देकर मानव मन को भक्ति उन्‍मुख किया था। आठ वर्ष एक महीना सात दिन की अल्प अवधि में उन्होंने 5018 प्रभात संगीत का अवदान मानव समाज को दिया। यही *नव्य- मानवतावादी प्रभात संगीत नए घराने के रूप में लोकप्रिय हो रहा है।*
झारखंड राज्य के शिव नगरी देवघर से शुरू हुए आशा के इस गीत को गाकर विश्व भर में अनेक जिंदगियां संवर गईं। रिनासां यूनिवर्सल राइटर एसोसिएशन के केंद्रीय सचिव आचार्य हरिशानन्द अवधूत ने कहा कि श्रीश्री आनंदमूर्ति ने पृथ्वी पर उपस्थित *मनुष्य के मन में ईश्वर के लिए उठने वाले हर प्रकार के भाव को सुगम व सुंदर भाषा और सुर में लयबद्ध कर प्रभात संगीत के रूप में प्रस्तुत किया।* उन्होंने कहा कि कोई भी मनुष्य जब पूर्ण भाव से प्रभात संगीत के साथ खड़ा हो जाता है, तो रेगिस्तान भी हरा हो जाता है। *संगीत तथा भक्ति संगीत दोनों को ही रहस्यवाद से प्रेरणा मिलती रहती है।* जितनी भी सूक्ष्म तथा दैवी अभिव्यक्तियां हैं, वह संगीत के माध्यम से ही अभिव्यक्त हो सकती हैं। मनुष्य जीवन की यात्रा विशेषकर *अध्यात्मिक पगडंडियां प्रभात संगीत के सुर से सुगंधित हो उठता है।*
उन्होंने कहा कि
प्रभात संगीत के भाव, भाषा, छंद, सुर एवं लय अद्वितीय और अतुलनीय हैं। संस्कृत, बांग्ला, उर्दू, हिंदी, अंगिका, मैथिली, मगही एवं अंग्रेजी भाषा में प्रस्तुत प्रभात संगीत मानव मन में ईश्वर प्रेम के प्रकाश फैलाने का काम करता है। संगीत साधना में तल्लीन साधक एक बार प्रभात संगीत का साधना करना चाहता है। आनंद मार्ग के महासचिव आचार्य चितस्वरूपानंद अवधूत ने बताया कि लगभग सात हजार वर्ष पूर्व भगवान सदाशिव ने सरगम का आविष्कार कर मानव मन के सूक्ष्म अभिव्यक्तियों को प्रकट करने का सहज रास्ता खोल दिया था। पूरे विश्व के भक्तगण, लेखक एवं कलाकार वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के दुष्प्रभाव के कारण अपने-अपने घर बैठे ही ऑनलाइन कला का प्रदर्शन कर रहे हैं।

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