कहानी : सबसे सच्चा इश्क़

प्रीतेश रंजन ‘राजुल’


जन्म : 1981ई. में, इलाहाबाद उत्तर प्रदेश में
शिक्षा : परास्नातक(हिंदी) इलाहाबाद विश्वविद्यालय से
रंगमंच में गहरी रुचि, कविता और व्यंग्य लेखन
सम्प्रति : जवाहर नवोदय विद्यालय सिवान, बिहार में हिंदी शिक्षक के रूप में कार्यरत


 

एक थी घड़ी। एक था वक़्त। दोनों में थी बड़ी मुहब्बत। वक़्त चलता। घड़ी चलती। दोनों चलते रहते। जनम जन्मांतर से। घड़ी को लगता मैं चल रही हूँ इसलिए वक़्त चल रहा है। वक़्त को भी घड़ी से इश्क़ था। इंसानों वाला इश्क़ नहीं; सच्चा मुच्चा इश्क़। घड़ी थी बहुत बहुत बातूनी। कभी टिक-टिक कभी टुक-टुक कभी टन-टन। वक़्त था शांत ,चुपचाप। दोनों साथ -साथ चलते इसलिए मिल न पाते। नदी के दो पाट की तरह। मीठी नदी को भी नमकीन समंदर से इश्क़ है। नदी है भागवान। मिल लेती है,समंदर का पानी पी लेती हैं। पर घड़ी का ऐसा नसीब कहाँ!
जब कुदरत सो जाती,रात का सन्नाटा जग जाता, कुत्ते रोते-रोते सो जाते, सियार माँदों से मैदानों में चले जाते, झींगुर गाते। जब टाइम टेबल की अंतिम पैसेंजर ट्रेन प्लेटफॉर्म को उदास कर चली जाती। जब हवा के दबाव से ओस चूकर हरी घासों को गीला कर देती,पेड़ सो जाते,पत्ते गिरना बंद हो जाते। जब मज़दूर के पैरों में लिपटे मच्छर खून चूसकर मोटे और लाल पेट वाले हो जाते, इत्ते मोटे कि उड़ न पाते। जब एटीएम का स्क्रीन काला हो जाता। जब नाइट गार्ड अंतिम बार सुर्ती खा चुके होते; रैन बसेरों में भिखारी चादर ओढ़ लेते। जब घरेलू महिलाओं द्वारा बरतन स्टैंड में धुले बरतनों का पानी चूकर सूख जाता। जब पेडों की, झाड़ियों की परछाइयाँ दूर से देखने मे भूत नज़र आती।
तब हाँ तब, शरारती वक़्त चुपचाप दबे पाँव आता। घड़ी का दिल बड़ी तेजी से धड़कने लगता। उसका बीपी 23:59 हो जाता । शरारती वक़्त घड़ी के जिस्म के ज़र्रे-ज़र्रे से ज़ोरा-ज़ोरी करता। घड़ी प्यार से कहती ,हट जूमुँहें।’ और वक़्त भाग जाता। घड़ी निढाल होकर 00:00 हो जाती। पर तत्क्षण इस मिलन से घड़ी फिर से टिक-टिक-टुक-टुक-टन -टन।
ये कहानी सदियों से चली आ रही थी। आदम हौव्वा के ज़माने से। मनु और शतरूपा इश्क़ करते-करते राजपाट छोड़ दिये। किसी चीज़ में मन न लगा। सोचे कि प्रेम से हटके क्या है, देखना है। सीतापुर के नैमिषारण्य पहुँचे। तपस्या की। भगवान खुश। बोले, मांगो क्या चाहिए मनुमहाराज बोले,’ आप जैसा पुत्र’। शतरूपा क्या कहती!बोलीं, ‘जो इनकी खुशी,वही हमारी।’ तो इश्क़ मरा नहीं। इश्क़ के आगे कुछ नहीं। तब से चला आ रहा है प्यार वक़्त और घड़ी का।
दोनों खुश थे। पहले घड़ी धूप में खड़ी होती थी। पसीने से लथपथ। फिर बालू की रेतों में जो कभी ठण्डा कभी गरम। वो कहते है न ! लोग मोहब्बत करने वालों के दुश्मन है। तो सभ्य हुए तो चौराहों पर नुमाइश के लिए घड़ी को घण्टा घर मे टांग दिया। कि बेटा अब करो बीच चैराहों पर मुहब्बत। दरअसल लोग मुहब्बत करना नहीं देखना चाहते हैं। फिर भी वक़्त, वक़्त निकाल ही लेता और घड़ी से मिल लेता। उसके बाद घड़ी को लोहों में बांधा गया। कीमती धातुओं में घड़ी को बदला गया। घड़ी आदमी की नज़र में खूबसूरत लगने लगी। सोने चाँदी से लैस तीन-तीन खेलते बच्चे लिए हुए। कलाई में बाँधने के लिए दो चैन मानो ब्लाउज़ के पीछे लटकती दो सुन्दर डोरियों की तरह। खूबसूरत घड़ी। आदमी के हाँथों में कैद।
रूप बदला, रंग बदला, चाल बदली ,चरित्र बदला। और घड़ी स्मार्ट हो गई। वो जासूसन हो चली।शक की सुई वक़्त के सीने में चुभने लगी। घड़ी को शक होने लगा कि उसका यार वक़्त गुलछर्रे उड़ाता है। आवारागर्दी करता है। आता था अभी भी वक़्त। घड़ी भी मिलती थी उसी अंदाज में। पर उनके मिलन को आदमी की नज़र लग गई।
सब जगहें उदास हो गईं। पहले चीन, फिर इटली, क्या अमेरिका, क्या हिंदुस्तान। जहाँ भी घड़ी और वक़्त डेटिंग का प्रोग्राम बनाते माहौल की उदासी मिलन का मज़ा किरकिरा कर देती।
आजकल घड़ी बहुत उदास है। उदास मतलब बहुत उदास। उसकी तो कोई वैल्यू ही नहीं रह गई है। वह देख रही है कि सुबह-सुबह हड़बड़ाती मम्मियाँ अपने बच्चों को जबरदस्ती नहला-धुला कर स्कूल नहीं भेज रही हैं। रोबीले मर्द ऑफिस नहीं जा रहे हैं। मुस्कुराती पत्नियाँ टाटा नहीं कर रही हैं। और अधिक जीने की आशा में बूढ़े लोग अलसुबह पार्कों में लॉफिंग एक्सरसाइज नहीं कर रहे हैं। और तो और मज़दूर काम पर जा नहीं रहे हैं, बल्कि लौटते ही जा रहे हैं..। पारदर्शी काँच की गिलास में सम्बन्धों की गरमाहट लिए सुबह की चाय की केतलियाँ चौराहों पर अपने मुँह से भाप उगलना बन्द कर चुकी हैं।
कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना। समाज, देश अखबार, टीवी सब के सब चिल्ला रहे हैं कि वक़्त खराब है। वक़्त को कोस रहे हैं। वक़्त को ऐसा नहीं करना चाहिए था।…और वक़्त अपने ऊपर लगाए गए आरोपों से दुखी है । बहुत दुखी। कौन मुआ ऐसा होगा जिसे बाहर, गली में, स्टेडियम में खेलते बच्चे न अच्छे लगते हों! आज भी दोनों रात के सन्नाटे में मिल लेते हैं चुप्पे। घड़ी वक़्त का कालर पकड़ रोती रही। वक़्त ने अपनी सफ़ाई में केवल इतना कहा, सबसे आसान होता है अपनी गलतियों को दूसरे पर थोपना। इन्होंने हमें अपना समझा ही कब था? चलना मेरी नियति है। ये भी मुझसे आगे दौड़ने की कोशिश करने लगे। ये चाहते है कि हम इनकी मुट्ठियों में क़ैद हो जाए। यहीं नहीं तुमको स्मार्ट बनाकर मेरी जासूसी करवा रहे हैं। जानती हो घड़ी, ये मशीनों से प्यार करते करते अपने को प्यार करना भूल गए हैं। इनका बस चले तो हमारे तुम्हारे नितांत व्यक्तिगत क्षण की भी वीडियो क्लीपिंग बना कर किसी वेबसाइट पर अपलोड कर दें।’
घड़ी ने माफी माँगी बोली, ‘जाने दो। ये आदम जात ही ऐसी है। सब ठीक हो जाएगा, पहले जैसा। लव यू जानू।’ वक़्त को मुस्कराना नहीं आता, पर राजुल को आता है, सो रात बारह बजे मैं मुस्करा दिया। और वक़्त चला गया चुपचाप। घड़ी भी चलने लगी टिक-टिक, टुक-टुक, टन-टन।

 

(नवोदयन्स हाईट्स कॉपीराइट संबंधी कोई दावा नहीं करता है। रचना पर लेखक का सर्वाधिकार है।)

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Veekesh Kumar
jnvyashu.ysy

Nice Story Time and Watch

Nice title and story .

6 months ago
डॉ सुगम तिवारी
jnvyashu.ysy

प्यार का एक नया शाश्वत रूप बताती कहानी जो चरितार्थ करती है उस कहावत को कि जहाँ न पहुँचे रवि,वहाँ पहुंचे कवि।”

6 months ago
Rajkumari swapna rani
jnvyashu.ysy

Bahut khoob Kya taal Mel bithaya hai prakrit aur manav ke gharelu jiwan charya se

Aati sundar

6 months ago

Review कहानी : सबसे सच्चा इश्क़.

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