काश नाम की बजाय विश्वविद्यालय के मौजूदा हालात के सुधार पर होता काम

-Yashaswi Yashawat
“Quot Rami Tot Arbores” मतलब ‘जितनी शाखाएं, उतने वृक्ष’। यह आदर्श वाक्य है, देश के चौथे सबसे पुराने विश्वविद्यालय का। जिसका नाम है इलाहाबाद विश्वविद्यालय, गाहे बगाहे इसके नाम को लेकर आजकल खूब चर्चा है। खैर अभी कार्य परिषद की बैठक में बहुमत के आधार पर नाम बदलने के प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया गया है। ऐसे में यह दिलचस्प है कि शहर के नाम बदलने के बाद से ही विश्वविद्यालय के नाम बदलने के लिए मांग क्यों उठ रही है? क्या है इस विश्वविद्यालय के बनने का इतिहास? क्यों यह सरकार से लेकर आम अवाम तक सबके नजर में है? 
कब और क्यों हुआ निर्माण?
    इस विश्वविद्यालय की स्थापना 23 सितंबर 1887 को हुआ। इसके स्थापना का श्रेय सयुंक्त प्रांत के तत्कालीन उप राज्यपाल सर विलियम मुइर  को जाता है। मुइर के ही प्रयासों के बदौलत इलाहाबाद (अब प्रयागराज ) में पहला स्वतंत्र कॉलेज खुला, जिसका नाम शुरु में सेंट्रल कॉलेज था फिर बाद में मुइर सेंट्रल कॉलेज कर दिया गया। इसकी आधारशिला तत्कालीन वायसराय लॉर्ड नॉर्थब्रूक ने रखी थी। बाद में इसी कॉलेज को विस्तार देकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय का निर्माण हुआ। 
    8 दिसंबर 1873 को सेंट्रल कॉलेज के शिलान्यास कार्यक्रम में विलियम मुइर ने कहा :  ” इलाहाबाद में सेंन्ट्रल कॉलिज की स्थापना की मेरी तीव्र इच्छा तभी से रही है जब मैंने अपना वर्तमान पदभार ग्रहण किया था। यहां आने के शीघ्र बाद मैंने पाया की इलाहाबाद में शिक्षा के बेहतर साधनों के लिए स्थानिय प्रमुख व्यक्तियों में प्रबल इच्छा विद्यमान हैं, और दृढ़ विश्वास से अति प्रभावित होकर मुझे प्रथम दरबार में एक सुअवसर प्राप्त हुआ जिसे मैंने यहां उन व्यक्तियों के अनुरोध पर आयोजित किया था जिन्होंने यह दर्शाने की आवश्यकता सामने रखी थी कि इस कार्य में सदभावना रखते हैं और उसमें योगदान करने के लिए उत्सुक हैं। ” इस कथन से है स्पष्ट है कि स्थानीय कुलीन एवं प्रबुद्ध जनों का उच्च शिक्षा के प्रति लगाव देखकर मुइर ने इस दिशा में कार्य किया। 
क्यों कहा जाता है ‘पूरब का ऑक्सफोर्ड’ ?
जल से मानव का पुराना रिस्ता रहा है, शायद यही वजह है कि दुनिया की अधिकांश मानव सभ्यताएं जलस्रोतों के आसपास विकसित हुई हैं। ब्रिटिश साम्राज्य के शहर भी इससे अछूता नहीं है। ब्रिटिशर्स ने अपनी शैक्षणिक निर्माण शहरों से थोड़ा दूर शांत और एकांत वातावरण में नदियों के आसपास करवाया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय का निर्माण भी उस समय के महान ब्रिटिश वास्तुविद विलियम इमरसन ने किया। विद्वानों और इतिहासकारों के अनुसार जब विश्वविद्यालय का निर्माण हुआ तब गंगा का प्रवाह क्षेत्र यूनिवर्सिटी बिल्डिंग से और समीप था। ऐसे में यहां का वातावरण भारत के अन्य तीन विश्वविद्यालयों की तुलना में विश्वविख्यात ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वातावरण से ज्यादा मेल खाता था। इतना ही नहीं इस विश्वविद्यालय ने अपने स्थापना के बाद से ही लगातार नए कीर्तिमान स्थापित किए। यह भारत के तीनों बड़े शहरों के विश्वविद्यालयों के तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से उभर रहा था। जिसके फलस्वरूप इलाहाबाद शहर भी आधुनिक शिक्षा नगरी माना जाने लगा। शायद यही वजह रही कि 1922 में पहली बार यहां सिविल सेवा परीक्षा का आयोजन हुआ, उसके बाद से निरंतर यह परीक्षा होती रही।  
नाम बदलने पर हो रहा है विचार
पिछले दिनों उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयागराज कर दिया। दरअसल प्रयागराज इस शहर का पुराना है जिसका प्रमाण शास्त्रों में मिलता है। इतिहास के अनुसार अकबर ने इस शहर का नाम बदलकर वर्तमान शहर का निर्माण किया। यहां यमुना के तट पर अकबर का मध्यकालीन किला भी है जो अब सेना का छावनी है। इसी नए शहर को आधुनिक ब्रिटिशयुग में विस्तार मिला। 
       शहर के नाम बदलने के साथ ही भाजपा व अन्य दक्षिणपंथी संगठनों ने विश्वविद्यालय के नाम परिवर्तन की मांग उठाई। इसमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के साथ-साथ कई नए-पुराने छात्रों और प्रोफेसरों ने भी इस मांग का सर्मथन किया। वही दूसरी तरफ समाजवादी और वामपंथी संगठनों ने इसका विरोध किया। 13 वर्षों बाद छात्रसंघ में जगह बनाने वाली कांग्रेस की छात्र विंग भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI), जो विश्वविद्यालय के समाजवादी और दक्षिपंथी राजनीतिक द्वंद्व के बीच जगह बनाने की कोशिश कर रही है, उसने भी इसे सरकार की राजनीतिक पहल बताया। 
       कौशांबी के सांसद विनोद सोनकर के राज्य सरकार को लिखे खत के बाद सरकार ने यह प्रस्ताव केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भेज दिया। विदित हो कि केंद्रीय विश्वविद्यालय होने के कारण राज्य सरकार का इस प्रक्रिया में कोई विशेष रोल नहीं था। निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार मंत्रालय ने विश्वविद्यालय के कार्य परिषद को यह प्रस्ताव भेज दिया जहां मुहर लगने के बाद मंत्रालय इस पर आगे की कारर्वाई करता। वही विश्वविद्यालय के 15 सदस्यों वाली कार्य परिषद के 12 सदस्यों ने इसके विपक्ष मे मेल कर सूचना भेजी। वहीं तीन सदस्य नाम बदलने के पक्ष में थे। इस प्रकार बहुमत के आधार पर विश्वविद्यालय का नाम नहीं बदलने का रिजोल्यूशन पास कर दिया गया है।
नाम से ज्यादा काम जरूरी है
133 सालों के अपने इतिहास में यह विश्वविद्यालय देश को एक से बढ़कर एक रत्न दिया। अपने स्थापना के शुरुआती वर्षों में ही इसने जो कामयाबी हासिल की, उससे इसे भारत के अग्रणी शिक्षा संस्थान के रूप में प्रतिष्ठा मिला। शिक्षा के साथ सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से भी इस विश्वविद्यालय का समाज निर्माण में अहम योगदान रहा है। मदन मोहन मालवीय जैसा शिक्षाविद्, जिन्होंने आगे चलकर बनारस विश्वविद्यालय की स्थापना की। न्यायमूर्ति मो. हिदायतुल्लाह जैसे न्यायविद्, जो भारत के राष्ट्रपति भी रहें। कमलेश, महादेवी वर्मा, हरिवंश राय बच्चन, दूधनाथ सिंह सहित दर्जनों साहित्यकार और भाषाविदों ने यहां से शिक्षा पाई। राजनीति के क्षेत्र में इस विश्वविद्यालय का अहम योगदान रहा है, यही वजह है कि इसे भारतीय राजनीति का नर्सरी भी कहा जाता रहा है। गुलजारी लाल नंदा, जाकिर हुसैन, चन्द्रशेखर और वी.पी. सिंह के अलाव नेपाल के पीएम सुर्यबहादुर थापा ने अपना राजनीतिक ककहरा इसी विश्वविद्यालय से सीखा है। इसके अलावा कई मुख्यमंत्रियों, केंद्र और राज्य के मंत्रियों
 विधायकों, सांसदों समेत कईयों को इस विश्वविद्यालय ने राजनीतिक मैदान में उतरने से पहले लंगोट कसने का सलीका सिखाया है।
             आज इसी के पूर्ववर्ती छात्र रहे मालवीय जी द्वारा स्थापित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय देश के सर्वश्रेष्ठ तीन विश्वविद्यालयों की सूची में शामिल है। इसके अलावा इसकी कई पूर्ववर्ती छात्र आईआईटी, एनआईटी, आईआईएम समेत देश के कई उच्च शिक्षण संस्थानों में बतौर प्रोफेसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। सिविल सेवाओं में उच्च पदों पर तमाम ऐसे लोग है जिनका रिस्ता विश्वविद्यालय से रहा है। कभी आजादी के राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रियता के साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी बेहतर प्रदर्शन करने वाला यह विश्वविद्यालय है, आज राजनीति और अपराध के दलदल में इस कदर फंसा है कि लगातार डूबती अपनी नैय्या को बचा पाना इसके लिए मुश्किल हो गया है। सरकार द्वारा जारी आंकड़ों की माने इलाहाबाद विश्वविद्यालय एनआईआरएफ द्वारा जारी भारत के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की सूची में 200 के भी बाहर है ऐसे में नाम बदलने से ज्यादा बड़ा मुद्दा इसके शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार अपराधिक वातावरण का अंत और रिक्त पदों पर भर्तियां होनी चाहिए थी। 
एक शे’र है कि 
वो जिन रास्तों पर इनका घर नहीं पड़ता,
उजड़ भी जाए इन्हें असर नहीं पड़ता।।
   इसी सोच ने शायद आज विश्वविद्यालय की स्थिति को बद से बदतर बना दिया है। हर नेता जानता है कि उसके बेटे को तो यहां पढ़ना नही है फिर इस पर मेहनत की जरूरत क्या है? परंतु यह आवश्यक है कि इसके शैक्षणिक गुणवत्ता को सुधारा जाए ताकि इसकी साख बच सके। यह महज एक विश्वविद्यालय नहीं वरन यह आधुनिक भारत में शिक्षा के इतिहास का एक धरोहर और प्रमाण भी है।
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Shashi prakash
jnvyashu.ysy

Outstanding

Nice thinking our perliament think about it

4 months ago

Review काश नाम की बजाय विश्वविद्यालय के मौजूदा हालात के सुधार पर होता काम.

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