जातीय जनगणना हुई,तो आरक्षण को लेकर भी बढ़ेगा दबाव

जातीय जनगणना हुई,तो आरक्षण को लेकर भी बढ़ेगा दबाव

पश्चिम बंगाल (NH Desk): जातीय जनगणना की मांग वैसे तो कोई नई नहीं है। राजनीतिक फायदे के लिए इसे समय-समय पर तूल दिया जाता रहता है। हालांकि सरकारों और नीति निर्माताओं ने इस मांग को कभी तवज्जो नहीं दिया। इसकी बड़ी वजह इससे देश के सामाजिक ताने-बाने के बिगड़ने का डर है। वैसे भी जाति-पंथ में बंटे समाज को पिछले कुछ वर्षो में जिस तरह से सरकार ने अपने प्रयासों से करीब लाने की कोशिश की है, वह जातीय जनगणना के बाद फिर से बिखर जाएगा। इसके साथ ही मौजूदा आरक्षण को भी नए सिरे से तय करने की नई मांग जोर पकड़ेगी। इसे लागू करने का दबाव भी बढ़ेगा।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की ओर से निर्धारित 50 फीसद की सीमा में है जातिगत आरक्षण

शायद यही वजहें हैं कि अब तक की सरकारों ने जातीय जनगणना की मुहिम को कभी आगे नहीं बढ़ाया। वर्ष 2011 में कांग्रेस की अगुआई वाली सरकार ने आर्थिक और सामाजिक जनगणना कराई थी। इसमें उसने जाति को भी शामिल किया था। हालांकि इसकी मंशा विकास की दौड़ में पिछड़ी रह गई जातियों की पहचान करना व उनके उत्थान के लिए नई योजना बनाना था। यही वजह थी कि सरकार ने इसका कोई आंकड़ा जारी नहीं किया। वैसे भी देश में मौजूदा समय में सरकारी नौकरियों व शैक्षणिक संस्थानों के दाखिले में आरक्षण की जो व्यवस्था है, उसमें जातीय आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने 50 फीसद की सीमा निर्धारित कर रखी है। यानी 50 फीसद से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता है।

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