जान लिजिए कोरोना काल से जुड़े कानूनी प्रावधान, आ सकते हैं काम

Hemant Kumar
 मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, सभी प्राणियों में श्रेष्ठ और ज्ञानी है ,मनुष्य को स्थान यह प्रदान करने का सबसे महत्वपूर्ण कारक है:- सामाजिक संतुलन और इस सामाजिक संतुलन को वास्तविक कार्य रूप देता है समाज में मौजूद कानून और विधिशास्त्र। ऐसे में जीवन को प्रभावित करने वाले सभी कारक जब किसी महामारी के प्रभाव में आते हैं तो कानून की महत्व को नजरअंदाज करने में कोई बुद्धिमता नहीं है।

      राष्ट्र महान बनता है देश में रहने वाले जनमानस से। शास्त्रों में उल्लिखित है :-
‛जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।’ इस श्लोक का अनुश्रवण करने वाला यह भारत अपने ग्रंथों के माध्यम से नागरिकों को ‛वसुधैव कुटुंबकम’ का भी पाठ पढ़ाता है यानी संपूर्ण विश्व एक घर के समान है।

      भारतीय संस्कृति प्राचीन काल से विश्व भर में विशिष्ट स्थान रखता है। विश्व भर के लोग भारत अपने उद्देश्यपूर्ति हेतु आए हैं तथा भारत के लोग भी विश्व भर में भ्रमण कर अपने ज्ञान और विज्ञान का प्रचार प्रसार किए हैं। परंतु सभी अनुभव और विज्ञान के आविष्कारों को मात देने वाला कोई अंधियारी छा जाए जिससे मनुष्य के अस्तित्व पर ही खतरा हो जाए। यह कल्पना मात्र नहीं हमारे अनुभव का विषय हो गया है।

वैश्विक परिदृश्य में कोरोना

      आज संपूर्ण मानव जाति एक वैश्विक काली साये के चपेट में आ रही है, परंतु इस वैश्विक महामारी में निराश होने की बजाय इसे एक चुनौती मान कर लड़ने की जरूरत है। क्योंकि मनुष्य की सबसे बड़ी खासियत है कि वह हर एक आपदा से उभरने और सिखने का जज्बा रखता है।

           31 दिसंबर 2019 को डब्ल्यूएचओ ने सर्वप्रथम चीन में कोरोना वायरस के होने की पुष्टि की। आज यह वैश्विक महामारी संपूर्ण विश्व के आहार -व्यवहार, विचार-विमर्श, व्यापार ,चिंतन-मनन, सब कुछ बदल कर रख दिया है।  11 मार्च 2020 को डब्ल्यूएचओ ने कोरोना वायरस से हो रहे इस बीमारी को कोविड-19 नोबल कोरोना वायरस के नाम से वैश्विक महामारी घोषित कर दिया। 1665 के लंदन के प्लेग महामारी और 1930 के आर्थिक मंदी के बाद अब तक यह सबसे भयावह महामारी कहा जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक कोरोना वायरस से संक्रमित होने पर 88 फीसदी को बुखार, 68 फीसदी को खांसी और कफ, 38 फीसदी को थकान, 18 फीसदी को सांस लेने में तकलीफ, 14 फीसदी को शरीर और सिर में दर्द, 11 फीसदी को ठंड लगना और 4 फीसदी में डायरिया के लक्षण दिखते हैं। रनिंग नोज यानी नाक बहना कोरोना वायरस का लक्षण नहीं माना जा रहा है। हां, एक बात ध्यान देने वाली है कि कई मामले ऐसे मिले हैं, जिनमें कोरोना के कोई लक्षण नजर नहीं आए हैं।

          यह एक संक्रामक रोग है जो बहुत ही तेजी से एक दूसरे में फैलता है। डब्लू एच ओ ने कुछ सावधानियों की सूची निकाली है और यह भी बताया है की कोरोना से बचाव के ये मूल मंत्र हैं। आइये इन्हें विस्तार में जानते हैं।

• सदैव बाहर से आने के बाद अपने हाथों को साबुन से करीब 20-30 सेकंड तक अवश्य धोएं।

• अपने हाथों को अपने मुख से दूर ही रखें, जिससे की संक्रमण होने पर भी आपके अंदर न जा पाए।

• लोगों से 5 से 6 फीट की दूरी सदैव बनाये रखें।

• जरूरी न हो तो बाहर न जाये।

• सार्वजनिक स्थानों पर जाने से बचें।

• सदैव मास्क और ग्लव्स पहने।

• संक्रमण की स्थिति में खुद को दूसरों से अलग कर लें और नजदीकी अस्पताल में सूचित करें।

भारत में हो रहे कानूनी प्रयास

            भारत में कोविड-19 के प्रभाव को देखने के बाद भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा 24 मार्च 2020 की रात्रि 12:00 बजे एपिडेमिक डिजीज एक्ट 1997 के तहत लॉक डाउन की घोषणा कर दी गई। तब से लेकर आज तक लॉक डाउन का सिलसिला जारी है, इस लॉक डाउन के दौरान भारतीय कानूनों में भी बदलाव और शक्तियों को क्रियान्वित किया गया है।
भारत इस कोविड-19 के वजह से अब अपने चौथे चरण के लॉक डालने में प्रवेश कर गया परंतु अब तक इस वैश्विक महामारी के उपचार का कोई संतोषजनक तरीका नहीं पता चला है। ऐसे में मानव जीवन को प्रभावित करने वाले सभी कारकों में बदलाव या प्रभाव होना लाजमी है।

संवैधानिक अधिकारों पर कोरोना का प्रभाव

            कोविड-19 के वजह से विश्व के सबसे महान और बड़ा लोकतांत्रिक देश भारत भी मजबूर है कि वह अपने नागरिकों को दी गई तमाम अधिकारों से समझौता करें। भारतीय संविधान अपने नागरिकों को तमाम तरह के अधिकार प्रदान करता है परंतु इस वैश्विक महामारी के स्थिति में भारतीय संविधान में दिए गए अधिकार जैसे :-

• अनुच्छेद 19(घ)- भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण का अधिकार

• अनुच्छेद 21- भारत के प्रत्येक नागरिक को प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार

• अनुच्छेद 22  – कुछ दशाओं में गिरपतारी और निरोध से संरक्षण

• अनुच्छेद 25  – अंतःकरण की और धर्म की अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता ।

• अनुच्छेद 28  – कुछ शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में स्वतंत्रता

• अनुच्छेद 30- अल्पसंख्यकों को शिक्षा संस्थान स्थापित करने और चलाने का अधिकार देता है।

           वस्तुतः यह किसी अलग संस्कृति के संरक्षण में शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका को मान्यता देता है. एक बहुसंख्यक समुदाय भी एक शैक्षणिक संस्थान खोल और चला सकता है।                                   ऐसे तमाम अधिकारों से समझौता करना पड़ा है, नागरिकों की अधिकारों को कम किया गया है, इन अधिकारों को कम करके सरकार के अधिकारों को शक्ति प्रदान की गई है। सरकार नागरिकों के मेल मिलाप , आवाजाही , वेशभूषा, पहनावा, धार्मिक आज़ादी इन सभी चीजों को नियंत्रित कर रही है। ताकि संक्रमण के फैलाव को रोका जा सके। ऐसे में भारतीय विधिशास्त्र मे कोविड-19 से संबंध रखने वाले कुछ नियमों और अधिनियमों पर प्रकाश डालना अति महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय हो जाता है।

भारत महामारी अधिनियम,1897

      Indian Epidemc Disease 1897, इस भयावह वैश्विक महामारी के फैलाव को रोकने के लिए एक बेहतर कानूनी विकल्प देता है। द एपीडीएम एक्ट के सेक्शन 3 में यह जिक्र किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति इस प्रावधान का उल्लंघन करेगा तो उसपर आई.पी.सी. की धारा 188 के अंतर्गत कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
द एपिडेमिक एक्ट 1897, पुराना होने के बावजूद भी कानून व्यवस्था में सहायता प्रदान किया है।

       इस संदर्भ में वर्तमान वर्ष 2020 की महामहिम राष्ट्रपति द्वारा घोषित एपिडेमिक डीजेज अमेंडमेंट ऑर्डिनेंस प्रासंगिक है। उल्लेखनीय है कि अध्यादेश में कारक के रुप में स्वास्थ्य कर्मियों के हितों को तथा उनके साथ हो रहे दुर्व्यवहार को मूल में रखा गया है। अध्यादेश के माध्यम से स्वास्थ्य कर्मियों को सबल बनाने का प्रयास किया गया है। संबंधित अध्यादेश में स्वास्थ्य कर्मियों के साथ हो रहे शरीरिक – मानसिक दुर्व्यवहार को बैलेंस के श्रेणी में रखा गया है। ऐसे बैलेंस की स्थिति में जांच एक आरक्षी श्रेणी के अधिकारी द्वारा 30 दिनों के भीतर करना आवश्यक है तथा न्यायालय द्वारा इसका ट्रायल 1 वर्ष के भीतर संपन्न करने की बात की गई है।

         स्वास्थ्य कर्मियों के साथ किसी भी हिंसा के मामले में सजा और क्षतिपूर्ति का प्रावधान किया गया है। इस के संदर्भ में 3 माह से 5 वर्ष तक का कारावास अथवा जुर्माना के रूप में ₹50000 से ₹200000 हो सकता है.। वही कुठाराघात  के मामले में 6 माह से 7 वर्ष तक का कारावास तथा ₹100000 से ₹500000 तक की जुर्माना हो सकता है।

यह स्पष्ट है की उपर्युक्त अधिनियम अध्यादेश हमारे स्वास्थ्य कर्मियों को सफलता प्रदान किया। परंतु इतने भयावह महामारी को रोकने के लिए भारतीय कानून सिर्फ एक अधिनियम पर आश्रित नहीं हो सकता तो आइए भारतीय कानूनों के रीड की हड्डी भारतीय दंड संहिता में कोविड-19 से संबंधित कानूनों तथा धाराओं पर बात किया जाए।

भारतीय दंड संहिता,1860

       भारतीय दंड संहिता 1860, 551 धाराओं के साथ विभिन्न प्रकार के दंडो का प्रावधान करती है, परंतु आई.पी.सी की धारा 172 ,173,174 ,177, 188, 189, 268, 269, 270 और 271 कोविड-19 के संदर्भ में प्रासंगिक है।

धारा 172 : समनों की तामील या अन्य कार्यवाही से बचने के लिए फरार हो जाना –

      जो कोई किसी ऐसे लोक सेवक द्वारा निकाले गए समन, सूचना या आदेश की तामील से बचने के लिए फरार हो जाएगा, जो ऐसे लोक सेवक के नाते ऐसे समन, सूचना या आदेश को निकालने के लिए वैध रूप से सक्षम हो, वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि एक मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, अथवा, यदि समन या सूचना या आदेश ‘[किसी न्यायालय में स्वयं या अभिकर्ता द्वारा हाजिर होने के लिए. या दस्तावेज अथवा इलैक्ट्रानिक अभिलेख पेश करने के लिए हो तो वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा ।

• धारा 173 : समन की तामील का या अन्य कार्यवाही का या उसके प्रकाशन का निवारण करना

• धारा 174 : भारतीय दंड संहिता की धारा 174 के अनुसार, जो कोई किसी लोक सेवक द्वारा निकाले गए उस समन, सूचना, आदेश या उद्घोषणा के पालन में, जिसे ऐसे लोक सेवक के नाते निकालने के लिए वह वैध रूप से सक्षम हो, किसी निश्चित स्थान और समय पर स्वयं या अभिकर्ता द्वारा हाजिर होने के लिए वैध रूप से आबद्ध होते हुए, उस स्थान या समय पर हाजिर होने का साशय लोप करेगा, या उस स्थान से, जहां हाजिर होने के लिए वह आबद्ध है, विधिपूर्ण समय से पूर्व चला जाएगा, तो उसे किसी एक अवधि के लिए सादा कारावास की सजा, जिसे एक महीने तक बढ़ाया जा सकता है, या पांच सौ रुपए तक का आर्थिक दण्ड या दोनों से दण्डित किया जाएगा।
अथवा, यदि समन, सूचना, आदेश या उद्घोषणा किसी न्यायालय में स्वयं या किसी अभिकर्ता द्वारा हाजिर होने के लिए है, तो उसे किसी एक अवधि के लिए सादा कारावास की सजा, जिसे छह महीने तक बढ़ाया जा सकता है, या एक हजार रुपए तक का आर्थिक दण्ड या दोनों से दण्डित किया जाएगा ।

        कोविड-19 के संदर्भ में देखा जाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 24 मार्च 2020 रात्रि 12:00 बजे से एपिडेमिक डिजीज एक्ट 1897 लगाने के साथ ही लॉक डाउन की घोषणा कर दी गई और यह स्पष्ट किया गया कि यदि किसी व्यक्ति द्वारा लॉक डाउन का उल्लंघन होता है तो उसे भारतीय दंड संहिता 1860 के धारा 188 के तहत कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

इस लॉक डाउन में धारा 188 की काफी चर्चा है

          1897 के महामारी कानून (Mahamari Act) के सेक्शन 3 में इस बात का जिक्र किया गया है कि अगर कोई प्रावधानों का उल्लंघन करता है, सरकार / कानून के निर्देशों / नियमों को तोड़ता है, तो उसे आईपीसी की धारा 188 के तहत दंडित किया जा सकता है। इस संबंध में किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा दिए निर्देशों का उल्लंघन करने पर भी आपके खिलाफ ये धारा लगाई जा सकती है।

            यहां तक कि किसी के ऊपर ये धारा लगाने व कानूनी कार्रवाई करने के लिए ये भी जरूरी नहीं कि उसके द्वारा नियम तोड़े जाने से किसी का नुकसान हुआ हो या नुकसान हो सकता हो। अगर आपको सरकार द्वारा जारी उन निर्देशों की जानकारी है, फिर भी आप उनका उल्लंघन कर रहे हैं, तो भी आपके ऊपर धारा 188 के तहत कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

सजा का प्रावधान

IPC की धारा 188 के तहत दो प्रावधान हैं-

पहला, अगर आप सरकार या किसी सरकारी अधिकारी द्वारा कानूनी रूप से दिए गए आदेशों का उल्लंघन करते हैं, या आपकी किसी हरकत से कानून व्यवस्था में लगे शख्स को नुकसान पहुंचता है, तो आपको कम से कम एक महीने की जेल या 200 रुपये जुर्माना या दोनों की सजा दी जा सकती है।

दूसरा, अगर आपके द्वारा सरकार के आदेश का उल्लंघन किए जाने से मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा, आदि को खतरा होता है, तो आपको कम से कम 6 महीने की जेल या 1000 रुपये जुर्माना या दोनों की सजा दी जा सकती है।

गौरतलब है कि क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC 1973) के पहले शेड्यूल के अनुसार, दोनों ही स्थिति में जमानत मिल सकती है और कार्रवाई किसी भी मैजिस्ट्रेट द्वारा की जा सकती है।

 भारतीय दंड संहिता की धारा 269 के अनुसार,

जो कोई विधिविरुद्ध रूप से या उपेक्षा से ऐसा कोई कार्य करेगा, जिससे कि और जिससे वह जानता या विश्वास करने का कारण रखता हो कि, जीवन के लिए संकटपूर्ण किसी रोग का संक्रमण फैलना संभाव्य है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा

        धारा 270 कहती है कि अगर किसी द्वेषपूर्ण कार्य से जिससे किसी के जीवन के लिए संकट खड़ा हो और रोग के फैलने की संभावना बढ़ जाए और जिसे जानबूझ कर किया गया हो,  साथ ही यह यह मानने का आधार हो कि उसने जानबूझ कर किसी के जीवन के लिए रोग का संक्रमण फैला कर संकट खड़ा किया है,  उसे दोषी माना जाएगा. उसे सश्रम या सामान्य कारावार में से किसी की भी सजा हो सकती है और यह जेल की सजा दो साल तक की हो सकती है, या दोषी पाए जाने पर जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा। दोनों धाराओं में सजा की अवधि लगभग समान है। हाल ही में प्रसिद्ध है बॉलीवुड सिंगर कनिका कपूर या मरकज केस में धारा 188 और 270 के आधार पर आरोप  लगे थे।

               गौरतलब है कि भारतीय दंड संहिता 1860 के धारा 271 में क्वॉरेंटाइन शब्द का प्रयोग किया गया है। आईपीसी की धारा 271 क्वॉरेंटाइन के नियमो के अवज्ञा से संबंधित है।
धारा 271, करन्तीन (Quarantine) के नियम की अवज्ञा (Disobedience) से सम्बंधित प्रावधान है। यह एक वह प्रावधान है, जो जब लॉकडाउन ऑपरेशन में हो, तब लागू हो सकता है।
इस प्रावधान के तहत, छह महीने तक का कारावास या जुर्माने या दोनों से दण्डित किया जा सकता है। [जानकारी के लिए बता दें कि आमतौर पर करन्तीन (Quarantine) का तात्पर्य, एक अवधि, या अलगाव के एक स्थान से है, जिसमें लोग या जानवर, जो कहीं और से आए हैं, या संक्रामक रोग के संपर्क में आए हैं, उन्हें रखा जाता है।]

          भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 271 के अंतर्गत यह कहा गया है कि, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर उस नियम की अवज्ञा करता है, जिसके तहत, कुछ स्थानों को, जहाँ कोई इन्फेक्शस रोग फैला है, उसे अन्य सभी स्थानों से अलग किया जाता है, तो ऐसा व्यक्ति, इस प्रावधान के तहत दोषी ठहराया जा सकता है।

           इस वैश्विक महामारी में भारतीय कानून के सीआरपीसी यानी दंड प्रक्रिया संहिता के नजर से सीआरपीसी की धारा 144 इस महामारी की छुआछूत से फैलाव को रोकने के लिए तथा समाजिक दूरी को कायम करने में बहुत ही प्रभावशाली है।

आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 

  अधिनियम की वस्तु और उद्देश्य के अनुसार इसका मकसद, आपदाओं का प्रबंधन करना है, जिसमें शमन रणनीति, क्षमता-निर्माण और अन्य चीज़ें शामिल है। आमतौर पर, एक आपदा को एक प्राकृतिक आपदा जैसे कि चक्रवात या भूकंप से समझा जा सकता है। इसके अलावा, इस अधिनियम की धारा 2 (डी) में “आपदा” की परिभाषा में यह कहा गया है कि आपदा का अर्थ है, “किसी भी क्षेत्र में प्राकृतिक या मानवकृत कारणों से या उपेक्षा से उद्भूत कोई महाविपत्ति…”। वर्तमान महामारी के प्रकोप को दूर करने के लिए, केंद्र सरकार ने COVID -19 प्रकोप को “गंभीर चिकित्सा स्थिति या महामारी की स्थिति” के रूप में “अधिसूचित आपदा” के रूप में शामिल किया है। इस लेख में हम आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के उन प्रावधानों के बारे में संक्षेप में बात करेंगे, जिन्हें मौजूदा समय में देश भर में लागू किया गया है।

          बाधा डालना (धारा 51) यदि कोई व्यक्ति किसी सरकारी कर्मचारी को उनके कर्तव्यों को पूरा करने से रोकता या बाधा डालता है, या केंद्र/राज्य सरकारों या एनडीएमए द्वारा जारी किए गए निर्देशों का पालन करने से इनकार करता है तो वह व्यक्ति इस धारा के अंतर्गत दण्डित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, इस धारा के अंतर्गत, दिशानिर्देशों का कोई भी उल्लंघन, जिसमें पूजा स्थल पर जाना, सामाजिक कार्यक्रम का आयोजन करना आदि शामिल हैं, सभी को इस धारा के तहत अपराध माना जाएगा। इस धारा के अंतर्गत, 1 साल तक की कैद एवं जुर्माना। हालाँकि, यदि उस व्यक्ति के कार्यों से जानमाल का नुकसान होता है, तो 2 साल तक की कैद एवं जुर्माना हो सकता है।

             मिथ्या दावे (धारा 52) इस धारा के अंतर्गत, वह मामले आयेंगे जहाँ यह आरोप लगाया जाए कि अभियुक्त ने कुछ ऐसा लाभ (राहत, सहायता, मरम्मत, निर्माण या अन्य फायदे) का दावा किया जोकि मिथ्या था, जैसे कि एक मामले में बाढ़ पीड़ितों हेतु वितरण के लिए लाये गए बिस्कुट को प्राप्त करने वाले व्यक्तियों (जोकि अभियोजन के मुताबिक बाढ़ पीड़ित नहीं थे) पर इस धारा को लगाया गया था।  इस धारा के अंतर्गत, दोषसिद्धि पर, कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से भी, दंडनीय होगा।

          धन/सामग्री का दुरुपयोजन (धारा 53) यदि कोई व्यक्ति राहत कार्यों/प्रयासों के लिए किसी भी पैसे या सामग्री का दुरुपयोग, अपने स्वयं के उपयोग के लिए करता है, या उन्हें ब्लैक में बेचता है तो वह इस धारा के अंतर्गत दोषी ठहराया जा सकता है। इस धारा के अंतर्गत 2 साल तक की कैद एवं जुर्माना हो सकता है।

           मिथ्या चेतावनी (धारा 54) यदि कोई व्यक्ति एक झूठा अलार्म या आपदा के बारे में चेतावनी देता है, या इसकी गंभीरता के बारे में चेतावनी देता है, जिससे घबराहट फैलती है जोकि वह जानता है कि झूठी है, तो उसका यह कृत्य इस धारा के अंतर्गत दंडनीय होगा। इस धारा के अंतर्गत, यदि कोई व्यक्ति ऐसा प्रयास करता है कि इस आपदा या उसकी गंभीरता के सम्बन्ध में आम जनता के बीच आतंक का फैलाव हो तो उसे इस धारा के अंतर्गत दण्डित किया जा सकता है। इस धारा के अंतर्गत, एक वर्ष तक का कारावास या जुर्माना हो सकता है।

इसके अलावा,

 धारा 55, सरकार के विभागों द्वारा अपराध से सम्बंधित है।

         अधिकारी की कर्त्तव्य-पालन में असफलता (धारा 56) यदि एक सरकारी अधिकारी, जिसे लॉकडाउन से संबंधित कुछ कर्तव्यों को करने का निर्देश दिया गया है, और वह उन्हें करने से मना कर देता है, या बिना अनुमति के अपने कर्तव्यों को पूरा करने से पीछे हट जाता है तो वह इस धारा के अंतर्गत दोषी ठहराया जा सकता है। इस धारा के अन्तर्गतं, 1 साल तक की कैद या जुर्माना हो सकता है।

         अध्यपेक्षा के सम्बन्ध में किसी आदेश के उल्लंघन के लिए शास्ति (धारा 57) आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 65 के अंतर्गत, राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति, राज्य कार्यकारिणी समिति, या जिला कार्यकारिणी समिति को यह शक्ति दी गयी है कि वह किसी भी संसाधन, वाहन या भवनों की आवश्यकता पड़ने पर, जो उसे आपदा के जवाब में अपना काम करने के लिए चाहिए या आवश्यकता है, तो वह उसकी मांग रुपी आदेश कर सके अर्थात ऐसे संसाधन, वाहन या भवनों के सम्बन्ध में अध्यपेक्षा का आदेश जारी किया जा सकता है। इसी सम्बन्ध में, धारा 57 के अंतर्गत, यदि कोई व्यक्ति इस तरह के अपेक्षित आदेश का पालन करने में विफल रहता है, तो वह इस धारा के अंतर्गत दोषी ठहराया जा सकता है। इस धारा के अंतर्गत, 1 साल तक की कैद एवं जुर्माना हो सकता है।

अधिनियम की अन्य धाराएँ

        (धाराएँ 58-60) इस अधिनियम की धारा 58, कंपनियों द्वारा अपराध से सम्बंधित है। इसके अलावा, जहाँ धारा 59 अभियोजन के लिए पूर्व मंजूरी (धारा 55 और धारा 56 के मामलों में) से सम्बंधित है, वहीँ धारा 60 न्यायालयों द्वारा अपराधों के संज्ञान से सम्बंधित है।

 आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955

      आवश्यक वस्तु अधिनियम को 1955 में भारत की संसद ने पारित किया था। तब से सरकार इस कानून की मदद से ‘आवश्यक वस्तुओं’ का उत्पादन, आपूर्ति और वितरण को नियंत्रित करती है ताकि ये चीजें उपभोक्ताओं को मुनासिब दाम पर उपलब्ध हों। सरकार अगर किसी चीज को ‘आवश्यक वस्तु’ घोषित कर देती है तो सरकार के पास अधिकार आ जाता है कि वह उस पैकेज्ड प्रॉडक्ट का अधिकतम खुदरा मूल्य तय कर दे। उस मूल्य से अधिक दाम पर चीजों को बेचने पर सजा हो सकती है।

आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 का मकसद

         खाने-पीने की चीजें, दवा, ईंधन जैसे पेट्रोलियम के उत्पाद जिंदगी के लिए कुछ अहम चीजें हैं। अगर कालाबाजारी या जमाखोरी की वजह से इन चीजों की आपूर्ति प्रभावित होती है तो आम जनजीवन प्रभावित होगा। साफ शब्दों में कहा जाए तो कुछ चीजें ऐसी हैं जिसके बगैर इंसान का ज्यादा दिनों तक जिंदा रहना मुश्किल है या इंसान के लिए बहुत ही जरूरी है। ऐसी चीजों को आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत आवश्यक वस्तु की सूची में डाल दिया जाता है। इसका एक ही मकसद होता है कि लोगों को जरूरी चीजें उचित दाम पर और आसानी से उपलब्ध हो जाए।

          आवश्यक चीजें इस श्रेणी में शामिल वस्तुएं
सात बड़ी वस्तुओं को इस श्रेणी में डाल दिया गया है जिनमें से कुछ इस तरह से हैं। 1. पेट्रोलियम और इसके उत्पाद जिनमें पेट्रोल, डीजल, नेफ्था और सोल्वेंट्स वगैरा शामिल हैं। 2. खाने की चीजें जैसे खाने का तेल और बीज, वनस्पति, दाल, गन्ना और इसके उत्पाद जैसे गुड़, चीनी, चावल और गेहूं, 3. टेक्सटाइल्स, 4. जरूरी ड्रग्स, 5. फर्टिलाइजर्स। इनके अलावा कई बार सरकार कुछ चीजों को आवश्यक वस्तु की श्रेणी में डाल चुकी है और बाद में स्थिति सामान्य होने पर निकाल दिया गया है। कभी लोहा और स्टील समेत कई उत्पादों को आवश्यक वस्तु की सूची में डाला गया था।

केंद्र और राज्य सरकार की ताकतें

         इस कानून के तहत केंद्र सरकार के पास अधिकार होता है कि वह राज्यों को स्टॉक लिमिट तय करने और जमाखोरों पर नकेल कसने के लिए कहे ताकि चीजों की आपूर्ति प्रभावित न हो और दाम भी मुनासिब रहे। सामान्य तौर पर केंद्र सरकार किसी चीज को जमा करके रखने की अधिकतम सीमा तय करती है और राज्य अपने मुताबिक उस सीमा के अंदर कोई खास सीमा तय कर सकती हैं। राज्य और केंद्र के बीच किसी तरह का मतभेद होने पर केंद्र का नियम लागू होगा।

सजा का प्रावधान

         इस कानून के सेक्शन 7(1) ए (1) के तहत अगर सही से रिकॉर्ड नहीं रखा, रिटर्न फाइल आदि करने में कानून का उल्लंघन किया तो इसे जुर्म माना जाएगा। इसके लिए तीन महीने से एक साल तक की सजा का प्रावधान है। सेक्शन 7(1) ए (2) में बड़े अपराधों जैसे जमाखोरी, मुनाफाखोरी, कालाबाजारी आदि के लिए सजा का प्रावधान है। इस स्थिति में सात साल तक जेल की सजा या जुर्माना, या दोनों हो सकता है।

मैं उम्मीद करता हूं कि ये जानकारी आपके लिए लाभप्रद होगा। हम सब अगर इन कानूनी प्रावधानों का पालन करते हुए संयम बरतते है तो यह जंग भी हम जीत जाएंगे। इंसान के आस्तित्व पर हमेशा कोई न कोई संकट आया है और इंसान इस संकट पर विजय पाया। अच्छे के उम्मीद के साथ, हम गाए, फिर जीत जाएगा इंडिया….।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में विधि छात्र है एवं सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं।)

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