संतोष पटेल की कविता ‘माउंटेनमैन दशरथ मांझी’

साहित्य डेस्क, NH


संतोष पटेल

जन्म : 04 मार्च 1974 , बेतिया (प. चंपारण, बिहार)

शिक्षा : अंग्रेजी , हिंदी और भोजपुरी ( लब्ध स्वर्ण पदक ) में स्नातकोत्तर व अंग्रेजी में एमफिल करने के बाद इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय , दिल्ली से पीएच.डी. ( हिंदी ) में रिसर्च स्कॉलर हैं।

संप्रति : दिल्ली सरकार में कार्यरत हैं ।


 ( यह कविता संतोष पटेल की 2019 में प्रकाशित कविता-संग्रह ‘जारी है लड़ाई’ से ली गई है। जिसमें दशरथ मांझी के इस महान साधना को अपने भावों में व्यक्त करते हुए संतोष सामाजिक अव्यवस्थाओं पर निर्ममता से प्रहार करते हैं। )

सतयुग के दशरथ से महान कलयुग का दशरथ /

एक राजा था एक रंक / एक भोगी था /

एक कर्मयोगी माँझी गरीब हैं

दीन – हीन / लाचार

किन्तु विचारों से महान है

जिसके हृदय में सागर का तूफ़ान है

क्योंकि तोड़ना है उसे एक पहाड़

चीरनी है छाती / एक पहाड़ की

निकालना है रास्ता

स्वयं के लिए नहीं परमार्थ में

भान हैं न आपको

शाहजहाँ ने भी बनवाया था ताजमहल /

प्रेम का एक स्मारक

मुमताज के प्रेम में बना बाइस वर्षों के प्रयास से /

अनवरत दशरथ मांझी ने भी

फगुनी देवी की याद में बनाया

एक स्मारक

तीन सौ फीट ऊँचे और तीन सौ फीट लंबे

पत्थर की छाती तोड़कर /

छैनी और हथौड़े की चोट से /

अपने पुरुषार्थ से / अपने पसीने की धार से

एक ऐसा स्मारक जिसे सदियां करेंगी याद /

सर्वदा /

सतत प्रकृति के रोड़े को तोड़ते , पत्थर के बीच /

उफ् / नहीं नहीं ,

यह तो दशरथ माँझी के शब्दकोश में था ही नहीं

यदि कोई तथाकथित ‘ बड़ा ‘ इसे करता

तो उसे मिलता भारतरत्न /

विनम्र प्रयत्न किन्तु दशरथ माँझी गरीब हैं /

दलित हैं , महादलित हैं कौन दिलाये उन्हें सम्मान

जिसकी पूंजी रही है / सदियों से / मात्र उपेक्षा या अपमान

पहाड़ों को काट कर बना रास्ता /

वस्तुतः एक स्मारक है /

अमर स्मारक माँझी के प्रेम की निशानी /

अपनी फगुनी के लिए

लेकिन वह मार्ग बन गया सुमार्ग

उसके बाईस वर्षों का अथक प्रयास /

छैनी और हथौड़े की चोट और

साथ में अनन्त / अनवरत /

कठिन श्रम का फल

सच है एक गरीब ठान ले तो

इतिहास बदल देता है /

यही थी दशरथ माँझी की

जिजीविषा पहाड़ों की छाती को चीरकर बना मार्ग /

या स्वर्ग का सुख पाने के समान

आइये इसे सराहें सुगन्धित हवा के झोंके की तरह

उनके श्रम स्वेद की करे वंदना

क्योंकि दशरथ माँझी

आज व्यष्टि से समष्टि का परिचायक

बन चुका है

और बन चुका है

व्यक्तिवाचक से भाववाचक

लाख अभावों के बाद भी ।

Review संतोष पटेल की कविता ‘माउंटेनमैन दशरथ मांझी’.

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