हर नवोदय कुछ कहता है !

-Anand Mehra

मैं जवाहर नवोदय विद्यालय हूँ।  1986 में बनी शिक्षा की राष्ट्रीय पॉलिसी के तहत मेरा जन्म हुआ जब  सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में एक अभूतपूर्ण प्रयोग करने का निश्चय किया की ग्रामीण प्रतिभाशाली और मेधावी छात्र -छात्राओं को उचित शैक्षिक माहौल दिया जाये ताकि वह अपनी प्रतिभा को निखार सके।   तब हरियाणा के झज्जर और महाराष्ट्र में अमरावती से शुरू हुआ सफर आज 660 तक पहुँच गया हैं।  रोज़ लाखो बच्चे मेरे आँगन में पलते -बढ़ते और अपने सपनो को साकार करने के लिए आगे बढ़ते हैं।    मेरे आँगन में जब एक नन्हा  बालमन अपनी तमाम जिज्ञासाओं से पहुचता हैं तो मेरा मन भी उतना ही आशंकित होता हैं की मैं उसके सपने पूरा कर पाउँगा या नहीं ?  वो मेरे आँगन में  अपने जिंदगी के सबसे अनमोल सात साल बिताता हैं , अपने सपने देखता हैं और उनको गढ़ने के लिए दिन रात मेहनत करता है तो मुझे भी अपने होने  का गर्व होता है। 

मैं उनके दिनरात का गवाह रहता हूँ। एक दस और ग्यारह साल का बालमन कैसे धीरे धीरे अपने को सजाता है , संवारता है , कैसे अपने को दुनिया से कदमताल करने को तैयार करता हैयह मैं रोज़ देखता और महसूस करता हूँ   बच्चो की निश्छल मुस्काने और परिजनो की यादो में बहाये उनके आंसुओ से मेरा प्रांगण का एक एक कोना भरा हुआ है। 

मेरा आँगन उस गुरुकुल के समान है जो कभी प्राचीन काल में हुआ करता था।  अभिभावक अपने पाल्यो को जब मेरे आँगन में उनके गुरुओ के सरंक्षण में इस उम्मीद के साथ छोड़ जाते है की अब ये गुरुजन इन नन्हे नौनिहालों को उचित शिक्षा , आचारव्यवहार का ज्ञान देंगे और जब ये इस प्रांगण से निकलेंगे तो दुनिया में अपना मुकाम स्थापित करने के लिए इनके तरकश में वो तमाम तीर जैसे ज्ञान , आत्मविश्वास , आत्मनिर्भरता , साहस से लबरेज होंगे जो इन्हे वो स्थान दिलाएंगे जिसके ये सारे बच्चे हकदार है। 

प्रातः से लेकर रात तक इन बच्चो के साथ मैं भी कदमताल करता हूँ और इनकी एक एक पदचाप जैसे मुझमे नयी धड़कन उत्पन्न करती है, और मेरे होने का एहसास दिलाती है।   वो प्रार्थना के स्वर , वो कक्षा का शोरगुल , वो मेस में चमच्चो की खनकती आवाज , वो खेल के मैदान का जोशयही सब क्षण तो मुझे इन बच्चो से जोड़ते है।  इनकी सिसकियाँ , इनकी बेबाक हँसी , इनकी दोस्ती के किस्से , वो हलकी फुलकी झड़पमुझमे रोज़ जान फूंकते है।  सात साल मेरे आँगन में बिताकर जब एक दिन ये मुझसे विदा लेते है तो मैं जार जार रोता हूँ मगर दिल को ढाँढस बँधाता हूँ की अब इन्हे मुझे उन्मुक्त आसमान में जाने ही देना पड़ेगा ताकि आगे ये अपने सपनो को मूर्त रूप दे सके और मेरे आँगन का नाम रोशन कर सके।  मैं दुखी मन से इन्हे विदाई देता हूँ और इनकी यादों को समेट कर बाँध लेता हूँ और फिर से रम जाता हूँ। 

1986 से शुरू हुआ मेरा यह सफर अब बत्तीसवें साल में प्रवेश कर गया है।  मेरा आँगन भी अब विस्तृत और भव्य हो गया है।  प्रारम्भ में मेरे पास अपने वजूद को बचाये रखने की जद्दोजेहद थी जो धीरे धीरे पुख्ता होती गयी और मुझे गर्व है की अब मैं 32 सालो से लाखो बच्चो के भाग्य निर्माण में सहायक बना हूँ , उनके सपनो का हमराज़ बना हुआ , उनके सुखदुःख का साक्षी बना हूँ।   बच्चो  और गुरुओ के आपसी प्रेम और आदर सत्कार का गवाह बना हूँ।  यही मेरी पूँजी है और यही मेरा लक्ष्य और उद्देश्य भी। 

आज जब अपने चारो ओर देखता हूँ और अपने आँगन के पुष्पो को जीवन की दौड़ में खिलखिलाते और कामयाबी की सीढ़िया चढ़ते देखता हूँ तो मन को असीम शांति और सुकून मिलता है और मुझे अपने होने का गर्व होता है और अपने इन बच्चो की कामयाबियाँ देखकर मेरा भी सीना चौड़ा होता है। मैं फिर से उसी जोशोखरोश के साथ अपने यहाँ पलबढ़ रहे बच्चो के साथ रम जाता हूँ।   ये सारे बच्चे मेरे अपने हैं और मैं इन्हें नवोदयन नाम देता हूँ। 

ये नवोदयन मेरी पहचान है।  मैं इन्ही से हूँ और ये सब मेरे अपने है।  मैं नवोदय हूँ।

जय नवोदय , जय नवोदयन।   

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