कब समझेंगे सियासत दाँ भारत को ‘युवा’ और ‘बुजुर्ग’ नीति की दरकार

-प्रदीप सारंग

भारत सर्वाधिक युवा देश है । युवा मतलब कार्यात्मक उर्जा । सचमुच दुनिया के अन्य देश इस ऊर्जा के मामले में भारत से काफी पीछे हैं और इसका मुख्य कारण भारत की जनसंख्या नीति और स्वास्थ्य सेवाओं में बेहतरी है। किन्तु युवा ऊर्जा उपयोग के मामले में भारत बहुत पीछे है जो अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है और इसका मुख्य कारण नीति नियामकों की अदूरदर्शिता रही है। कोई व्यक्ति या देश ऊर्जा या संपदा का बड़ा भण्डार हो जाने से धनिक नहीं कहलाता है बल्कि अपनी ऊर्जा /संपदा का  अपने उत्थान में कितना बेहतर उपयोग कर पा रहा है, यही मानक होता है धनी और प्रगतिशील होने का। जहाँ पूर्वजों की दूरदर्शी-जनसंख्या नीति के कारण  “युवा शक्ति” के मामले में भारत को सर्वाधिक सौभाग्यशाली होने का गौरव प्राप्त हो रहा है वहीं  अपने देश में युवा नीति का न होना हमारी लापरवाही और बेचारगी का बोध भी करा रहा है। किसी ने कहा है कि मानव जीवन पिघलती हुयी आइस कैण्डी की तरह है जिसे “टेस्ट करो या वेस्ट” दोनों स्थितियों में नष्ट हो ही जाना है । भारत को फालतू मामलों में गौरव अनुभूति की आदत पड़ गयी है । किसी भी  दूरदृष्टा के लिए इस बात में कोई गौरव नहीं कि उसके पास लगातार व्यर्थ नष्ट हो रही ऊर्जा कितनी है बल्कि  प्रगति  के निमित्त इस ऊर्जा के बेहतर उपयोग हेतु उसके पास योजना कितनी समर्थ है।आजादी के इतने वर्षों बाद भी राष्ट्र निर्माण एवं राष्ट्रोत्थान के लिए भारत के पास युवा शक्ति के बेहतर उपयोग की कोई ठोस नीति नहीं है । परिणामतः  हमारी युवा शक्ति का बड़ा हिस्सा या तो राष्ट्र निर्माण से विरत है, और निष्क्रिय होकर अपनी ऊर्जा का क्षरण कर रहा है अथवा गुमराह होकर विध्वंस के कार्यो में आनंदित हो रहा है यानि युवा ऊर्जा का विध्वंसकारी  उपयोग हो रहा है।

बेहद शर्मनाक है कि बड़ी संख्या में किसी प्रान्त का युवा नशे की तरफ उन्मुख है तो किसी प्रान्त का युवा बेरोजगार होकर विकास की मुख्यधारा से अलग थलग, अंधविश्वास और धर्मान्धता की चपेट में है। अपने राष्ट्र के प्रति समर्पण एवं जिम्मेदारी का आलम ये है कि वयस्क होने के साथ मतदाता सूची में नाम तक अंकित कराने को संवेदनशील नहीं हो पाते हैं। ऐसा सब उचित और जरूरी शिक्षा के अभाव का परिणाम है। दरअसल शिक्षा का ही दायित्व होता है किसी देश के लिए “सभ्य समझदार कुशल” नागरिक तैयार करना। भारत की शिक्षा की असफलता का हाल यह है कि विज्ञान से पढ़ाई करने वालों में वैज्ञानिक-दृष्टिकोण नहीं होता है और साहित्य से पढ़ने वालों में समझ और संस्कार नहीं होते हैं। एम0ए0 पास नागरिक अपनी जरूरतों का प्रार्थना पत्र नहीं लिख पाते हैं। शनैः शनैः भारत के रोम रोम में भ्रष्टाचार व्याप्त होता गया है, आदि- इत्यादि। आजादी के इतने वर्षों तक यदि भारत इन आत्मघाती स्थितियों से निपटने का मुकम्मल तंत्र विकसित नहीं कर सका है तो कमजोर इच्छा शक्ति और अदूरदर्शिता के शिवाय क्या हो सकता है? देश के लिए सभ्य, समझदार, समर्पित, कुशल, युवा-निर्माण के लिए एक युवा नीति होनी चाहिए थी। युवा नीति बनाये जाने की आवाज  धीमे स्वरों में पिछले कई दशकों से यदाकदा उठाई जाती रही है, किन्तु…..। एक सशक्त युवा नीति भारत की 60 प्रतिशत चुनौतियों से निपटने हेतु सक्षम होगी। परन्तु सियासत दाँ कब समझेंगे पता नहीं।   

      इस सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि आज के ये “कुशल, अकुशल, अनगढ़, ओजस्वी युवा” जब कल बुजुर्ग हो जायेंगे तब यही भारत दुनियाँ का सर्वाधिक बुजुर्ग  देश भी हो जायेगा । विडम्बना यह है कि भारत के पास न तो युवा नीति है न ही बुजुर्ग नीति। आज भारत में बुजुर्गो की क्या स्थिति है किसी से छुपी हुयी नहीं है। अपनी नई पीढ़ी को  ऊँगली पकड़कर चलना सिखाने वाला इंसान जब खुद बुजुर्ग हो जाता है तो अपनों के बीच रहते हुए भी वो अलग थलग होकर एकाकीपन का दंश झेलने को मजबूर होता है ।कहने के लिए सभी के पास बड़ी बड़ी बातें हैं किंतु सच्चाई यही है कि सरकारों की प्राथमिकता में न तो युवा ही रहे हैं और न ही बुजुर्ग। वृद्धा पेंशन के नाम पर कुछ धनराशि दी जाती है जो सिर्फ आंकड़ों के लिए ही है अन्यथा 300 से 500 रुपये महीने में क्या हो  पाता होगा ये समझने तक कि फुर्सत किसी सरकार को नहीं रही है। महंगाई के इस दौर में 100 रुपये रोज़ से कम नही होनी चाहिए वृद्धा पेंशन। बुजुर्गों के लिए दो योजनायें सरकारों को संचालित करनी चाहिए। एक उनके निःशुल्क इलाज की योजना। दूसरी पेंशन की योजना।         

    अगर हम सिर्फ शासकीय / अर्धशासकीय पदों से सेवानिवृत्त कर्मचारियों की रूचि अनुसार उनकी ऊर्जा के उपयोग की योजना बनाएं तो राष्ट्र् को अनंत उंचाईयों की तरफ ले जाकर बुजुर्गों को न सिर्फ  एकाकीपन के दंश से बचाया जा सकता है बल्कि उन्हें गौरव अनुभूति दी जा सकती है । अनेक बुजुर्ग सेवा निवृत्ति के पश्चात रूचि के काम खोजते देखे जा सकते हैं ।           

 संसद, विधान सभाओं और सरकार में बैठे वर्तमान युवाओं!  को समय रहते जागना होगा, बुजुर्गों की समस्याओं को समझना होगा, युवाओं की ऊर्जा का रचनात्मक उपयोग करने हेतु कुछ ठोस निर्णय लेने होंगे, अंधविश्वास और धर्मांधता से युवाओं को बचाना होगा अन्यथा विध्वंशकारी दिशा में सक्रिय “भारत का युवा” राष्ट्र के लिए अभिशाप होता जाएगा।

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