इस IAS ऑफिसर का सपना था कि गरीबों को उनका अधिकार दिलाकर उनकी सेवा कर सके

-Manoj Swatantra, Kanpur

संघप्रिय ने आईएएस बन न सिर्फ पिता, परिवार बल्कि शहर का भी नाम रोशन किया है। संघ ने यूपीएससी परीक्षा में 92वीं रैंक हासिल की है। सिविल सेवा परीक्षा में कानपुर के होनहारों का अच्छा प्रदर्शन रहा है। कानपुर देहात के झींझक में हेल्थ सुपरवाइजर पद पर काम करने वाले जय कृष्ण व गृहणी माधुरी देवी का बेटा संघ प्रिय शुरू से ही होनहार थे। जय कृष्ण का परिवार कानपुर दक्षिण के कर्रही मोहल्ले में रहता है। कानपुर देहात स्थित नवोदय विद्यालय से पढ़ाई करने के बाद संघ ने जेईई एडवांस्ड क्वालीफाई कर आईआईटी कानपुर में बीटेक में दाखिला लिया। वर्ष 2015 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग से डिग्री पूरी करने के बाद संघ ने नौकरी नहीं की। संघ ने ‘‘नवोदयन्स हाईट्स’’ को बताया कि वह शुरू से ही आईएएस बनना चाहता थे। उनका सपना था कि वह आईएएस बन गरीबों की सेवा कर सके और उन्हें उनका अधिकार दिला सकें। दूसरी बार के प्रयास में सिविल की परीक्षा में उन्हें सफलता मिली है।

संघ प्रिय ने आईएएस बनकर न सिर्फ माता पिता का नाम रौशन किया है बल्कि हजारों नवोदयन्स को भी गौरवांवित किया है। साथ ही उन तमाम छात्र/छात्राओं को राह दिखाई है, जो इस क्षेत्र में जाने का सपना संजोये रहते है।

आइये जानते हैं संघ प्रिय के विद्यालय जीवन और कुछ अनुभवों के बारे में उन्हीं की जुबानी

प्रश्न- नवोदय में जाने का सपना कैसे साकार हुआ ?


उत्तर- यह वर्ष 2002 की बात है जब मैं गाँव में स्कूल में अध्ययन कर रहा था तब नवोदय विद्यालय के बारे में गाँव स्तर पर अधिक जानकारी व् जागरूकता का अभाव था। अतः नवोदय जैसे प्रतिष्ठित विद्यालय में प्रवेश प्राप्त करना सपना सा लगता था। इस सन्दर्भ में मेरे गाँव के अध्यापक श्री कृष्ण मोहन जी का मैं आजीवन आभारी रहूँगा कि उन्होंने नवोदय विद्यालय के संबंध में जानकारी जुटाई और मेरे गाँव से कई छात्रों का फॉर्म नवोदय विद्यालय प्रवेश परीक्षा के लिए भरवाया। मैं नियति और समय का आभारी हूँ कि इस तरह की परिस्थितियाँ बनी की मैं नवोदय विद्यालय का टेस्ट दे पाया और सफलता प्राप्त की। आज जो मुकाम हासिल किया है उसकी प्रथम सीढी नवोदय में प्रवेश के साथ ही आरम्भ हुई थी।


प्रश्न- नवोदय में पहले दिन की खुशी, और अंतिम दिन की यादें क्या थी, या आप कभी भावुक हुए हैं ?


उत्तर- पहले दिन जब अपने घर पर माता जी से विदाई ली और अपने गाँव के बाहर निकला तब एक डर का भाव भी आया तथा मन भावुक भी हुआ परन्तु प्रसन्नता थी कि मैं अपने गाँव का प्रतिनिधित्व करते हुए नवोदय विद्यालय में पढने जा रहा हूँ। यह एक 10 वर्ष के छात्र के लिए बहुत बड़ा क्षण था । मुझे वो क्षण याद है जब मैं स्कूटर के पीछे अपना बक्सा पकड़े और गले में बक्से की चाभी डालकर नवोदय प्रांगण में प्रवेश किया। एक बाल मन में नयी जगह के प्रति जिज्ञासा मेरे जेहन में भी थी। सात वर्षो का समय कब कट गया पता ही नहीं चला और अंतिम दिन भी आ गया जब सब अपना बक्सा वापस समेटने लगे इस बार कई सारी यादों और जीवन भर के मित्रो से बक्सा और मन भी भारी हो रहा था।हम सब एक दुसरे को विदाई दे रहे थे । जिसके अभिभावक पहले लेने आ रहे थे हम सब बाकी लोग उस मित्र को उसके सारे सामान के साथ टेम्पो स्टैंड तक विदाई देने जाते थे। ऐसे ही मेरा नंबर भी आ गया और मैंने भी सबसे जुड़े रहने का वादा कर के नम आँखों से स्कूल से विदा ली। भावुकता के क्षण जीवन में कई बार आयें हैं। खासकर उन लम्हों को याद कर जो सुखद याद समेटे हुए हैं जैसे नवोदय में बिताये पल नवोदय के बाद आईआईटी में भी मित्रों के साथ कई बार नवोदय के प्रसंगों का जिक्र करते समय भी कई बार ऐसे पल आये।

प्रश्न – नवोदय में आपका पसंदीदा सब्जेक्ट, खेल नाश्ता और टीचर कौन थे ?

उत्तर- पसंदीदा सब्जेक्टः गणित, हिंदी, खेलः क्रिकेट, नाश्ताः पूरी सब्जी, टीचरः हिंदी मैडम (श्रीमती रमा पाण्डेय)


प्रश्न- नवोदय में सबसे ज्यादा आपने किसको मिस किया और क्यों?


उत्तर- माता पिता को और घर का खाना क्योंकि इनका कोई विकल्प नहीं होता।


प्रश्न- नवोदय से निकलने के बाद आपका सपना क्या था ?


उत्तर- नवोदय में मिले मंच का उपयोग कर अपने लिए एक बेहतर करियर बनाना, एक अच्छा नागरिक बनना तथा परिवार, गाँव और समाज के लिए अपना योगदान देना।


प्रश्न- आपके सपने में बाधक चुनौतियाँ कौन कौन सी थी ? और आप ने उन सब पर विजय कैसे पायी?


उत्तर- मेरे सपने में कई चुनौतियाँ थी जो बाधक बन सकती थी जैसे अंग्रेजी में सहज observation की कमी, आत्मविश्वास की कमी, अपनी योग्यता पर कम भरोसा तथा अंतर्मुखी व्यक्तित्व।
आज मुझे लगता है की मैंने उपरोक्त चुनौतियों पर काफी हद तक विजय प्राप्त की है। जब मैं सोचता हूँ की इस परिवर्तन के क्या कारण रहे तो निम्न बिन्दुओं को पाता हूँ।
(1.) यह एहसास की सीखने के लिए स्वयं का थोड़ा बहुत मजाक सहना तथा उसके लिए तैयार रहनां
(2.) observation को सम्रिद्ध करना तथा जीवन में जिसके सीख सके उससे सीखने के लिए तैयार रहना।
(3.) सीखने की प्रक्रिया में अहं अथवा घमंड का बिलकुल न होना।
(4.) स्वनियंत्रण कर पाने की क्षमता तथा समय की आवश्यकता के अनुसार चीजों को अपनाना।
(5.) जीवन की प्राथमिकताओं को जानना तथा अपनी मूल प्राथमिकता से समझौता न करना।
(6.) अनुशासन तथा कठिन परिश्रम (सही दिशा में)


प्रश्न- आपकी तैयारी और प्रेरणा स्रोत विस्तार से बताएं ?


उत्तर- सिविल सेवा की तैयारी ने भी मेरे व्यक्तिव्य निर्माण में अहम योगदान दिया है चाहे वह अंतिम अभूतपूर्व परिणाम हो या मेरी सुधरी हुई अंग्रेजी में बात करने की क्षमता हो या जीवन के विभिन्न क्षेत्रो के बारे में ज्ञान हो।
मेरे आईएएस बनने के कई प्रेरणास्रोत हैं जैसे मेरा गाँव और परिवेश जहाँ मैं पला बढ़ा और वो संस्कार और भाव मेरे व्यक्तित्व का अंग बने जिससे मैंने आईएएस के मंच को अपने जैसे गाँवों की तस्वीर बदल पाने के रूप में देखा,एक अन्य प्रेरणास्रोत था मेरा आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में प्रवेश,जब मैं ग्रेजुएट हो रहा था उस वर्ष मुझे लगा की मुझमे योग्यता है की मैं सिविल सेवा उत्तीर्ण कर सकता हूँ और आईएएस बन सकता हूँ। मैं इस भरोसे के साथ सिविल सेवा की तैयारी में जुट गया।
मैंने सिविल सेवा की अपनी तैयारी बहुत ही साधारण रूप से आरम्भ की थी। जैसा कि अधिकतर नवोदय के छात्र 10वीं तक सामाजिक विज्ञान हिंदी में ही पढ़ते हैं मैंने भी हिंदी में पढ़ी थी परन्तु सिविल सेवा में मैंने अंग्रेजी माध्यम चुना क्योंकि आईआईटी के बाद मैं अंग्रेजी में भी सहज हो गया था बस आवश्यकता थी कुछ अंग्रेजी शब्दावली से परिचय की जो मैंने हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में एक साथ स्वाध्ययन से पूरी की।
जैसे जैसे समय बीता मैंने परीक्षा के हर स्तर के मांग के अनुसार अपनी तैयारी को ढाला तथा जिस विषय विस्तार और गहराई की आवश्यकता थी मैंने उसे प्राप्त किया । मुझे खुशी है कि मैं यह परिवर्तन स्वयं की तैयारी में ला सका । यह उपरोक्त लिखे बिन्दुओं के पालन से संभव हो पाया।


प्रश्न- आप इस मुकाम तक पंहुंचे ,कैसा लग रहा है, अपनी उपलब्धियों पर संतोष है या कुछ और बेहतर करने की तैयारी है?


उत्तर- बन पाना जीवन का सबसे सुखद अनुभव है। ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे जीवन की सारी सफलताएँ एवं असफलताएँ ….सुख एवं दुख के क्षण….जीवन के समस्त निर्णय….. सभी गंतव्य ……सब कुछ इस परीक्षाफल में परिणत हुए हैं। मुझे अपनी इस उपलब्धि पर संतोष ही नहीं अत्यंत हर्ष है। अब मेरा कर्त्तव्य और दायित्व है कि जो मंच आईएएस जैसी प्रतिष्ठित सेवा प्रदान करती है उसका उपयोग मैं एक बेहतर समाज और देश निर्माण में करूँ। मैं प्रशासन में अपनी सकारात्मक और रचनात्मक ऊर्जा लगाकर अपने स्तर से योगदान देना चाहता हूँ।


प्रश्न- आज इस मुकाम पर पंहुचने के बाद समाज में और बेहतर क्या करना चाहते है?


उत्तर- मैं समाज में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रगति में विशेष रूप से अपना योगदान देना चाहूंगा क्योंकि शिक्षा में प्रभाव का मैं स्वयं ही एक उत्पाद हूँ अतः आवश्यकता है सबको बेहतर अवसर प्रदान करने की।


प्रश्न- आपका नवोदयन्स को प्रेरणादायक संदेश।


उत्तर- सभी जूनियर्स को यही सन्देश है कि नवोदय के सात वर्षो को सकारात्मक कार्यों में लगाएं तथा वहां उपलब्ध संसाधनों का भरपूर उपयोग करें। हम सब सौभाग्यशाली हैं कि हमें नवोदय जैसे स्कूल में अध्ययंन का अवसर मिला। कहानियाँ सबकी होती हैं अतः अपनी कहानी आप स्वर्ण अक्षरों में स्वयं लिखें। बाकी सीनियर्स या अन्य आपको मार्गदर्शन दे सकते हैं अपने अनुभव साझा कर सकते हैं , उनका सहयोग लें और आगे बढ़ें ।

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