मेरी शिक्षकीय यात्रा (संस्मरण )

-NK Kaushik,NH Desk,Bhopal


नवोदय विद्यालयों की स्थापना केन्द्र सरकार का एक ऐतिहासिक फैसला था। ग्रामीण क्षेत्र के कई विद्यार्थी यदि नवोदय विद्यालय नहीं खुलते तो शायद कक्षा पाँचवी से आगे नहीं पढ़ पाते, वे आज वहां से पढ़कर उच्च शिक्षित हो गये हैं। नवोदय विद्यालय आवासीय होने से छात्र-छात्राओं में वहां जो आत्मनिर्भरता व आत्मविश्वास का संचार होता है वह एक डे-स्कूल में संभव नहीं है। नवोदय विद्यालयों में शिक्षकों व छात्र-छात्राओं के मध्य एक मजबूत बन्धन का निर्माण होता है। यहां भी केन्द्रीय विद्यालयों की भांति वर्ष भर अन्तर्सदनीय प्रतियोगिता होती रहती हैं, जो विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास में बहुत योगदान देती है। नवोदय विद्यालय के 20 वर्षीय कार्यकाल में मध्यप्रदेश के सीहोर, सिवनी, इन्दौर व होशंगाबाद जिलों में स्थित नवोदय विद्यालयों में अपनी सेवाएं दी। यह पूरा कार्यकाल चुनौतीपूर्ण रहा, वहां न तो कोई छुट्टी, न कोई त्यौहार यहां तक कि कई बार स्वयं के स्वास्थ्य की भी अनदेखी की। फिर भी इसमें कोई दो राय नहीं नवोदय विद्यालय के सेवाकाल ने मुझे बहुत सिखाया। अन्य स्कूलों के छात्र तो शायद मुझे भूल गये होंगे परन्तु नवोदय विद्यालय से 25 साल पहले निकला विद्यार्थी आज भी मिल जाता है तो झुककर सबसे पहले पांव छूता है, यह है वहां की संस्कृति। आज भी भोपाल में मेरा चिकित्सक, मेरा आयकर सलाहकार सभी नवोदय विद्यालयों से निकले मेरे ही विद्यार्थी हैं, बहुत आत्मीयता रखते हैं।


मेरा जन्म मन्दसौर जिले की मल्हारगढ़ तहसील के छोटे से गांव कनघट्टी में हुआ था। गांव में कच्चा मकान था, जिसकी छत कवेलू की थी, इसी मकान में हम सात भाई-बहिन व माता-पिता रहते थे। पिताजी थोड़ी सी कृषि व अपने वैद्यक व्यवसाय से पूरे परिवार का पालन-पोषण करते थे। पिताजी कक्षा 4 पास थे, जबकि माताजी निरक्षर पर अति धार्मिक गृहिणी थी। मेरा जन्म कब हुआ इसका कोई प्रमाण नहीं है। शायद पिताजी 13 जुलाई को मुझे गांव की प्राथमिक शाला की कक्षा एक में भर्ती करने ले गये होंगे, तो शिक्षक ने 13 जुलाई ही मेरी जन्म तारीख लिख ली। उस जमाने में माता-पिता जो भी जन्म तारीख बताते उसे ही प्रमाण मान लिया जाता था। बाद में गांव की यही प्राथमिक शाला मिडिल स्कूल बन गई। यहीं से मैंने कक्षा आठवीं पास की। मेरे गांव की 15 कि.मी. की परिधि में और दूसरा मिडिल स्कूल नहीं था। अतः पड़ोस के कई गांवों के बच्चे भी मेरे ही गांव में पढ़ने आते थे। मेरे गांव के स्कूल का अपना पक्का भवन, खेल के मैदान, पीने के पानी का कुंआ व पर्याप्त अध्यापक थे। कक्षाएं नियमित चलती थी। सायंकाल खेलकूद होते थे, मुझे आज भी याद है मेरे हेडमास्टर का नाम श्री वर्दीचंद गुप्ता था तथा एक शिक्षक त्रिपाठी जी उसी गांव के रहने वाले थे। कक्षा आठवीं पास करने के बाद आगे की पढ़ाई हेतु मुझे गांव से 20 कि.मी. दूर जिला मुख्यालय मन्दसौर जाना पड़ा, जहां से मैंने 1969 में हायर सेकेण्डरी व बाद में वहीं से शासकीय महाविद्यालय से बी.एस-सी. पास की। मन्दसौर शहर में मैं एक कमरा किराये से लेकर रहता था, किराया शायद होता था रुपये 5 प्रतिमाह। उस जमाने में विद्यार्थियों की दो प्रमुख कठिनाईयां थी, एक तो आर्थिक समस्या जिसका हल मैं स्वयं अपना भोजन बनाकर करता था व भोजन का कच्चा सामन गांव से ले आता था। दूसरी समस्या थी अंग्रेजी भाषा की। पूर्ण ग्रामीण परिवेश से आये बालकों के लिए अंग्रेजी बहुत बड़ी समस्या था, फिर बी.एस-सी. में पढ़ाई का माध्यम अनिवार्य रूप से अंग्रेजी था। इसके तोड़ हेतु मैंने भार्गव का अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोष खरीदा था, जिससे बड़ी मुश्किल से मेरी नैया पार हुई व 56ः अंकों से बी.एस-सी. उत्तीर्ण की। बी.एस-सी. के मेरे शिक्षक थे डाॅ. छत्री, श्री अम्ब जिनके नाम मुझे आज भी मुझे याद हैं।
बी.एस-सी. के बाद एम.एस-सी. करने की इच्छा हुई, उस समय एम.एस-सी. की सुविधा विक्रम विश्वविद्यालय के मुख्यालय उज्जैन से ही थी, जहाँ जाकर पढ़ाई करना मुझ जैसे एक ग्रामीण विद्यार्थी के लिये आति कठिन था। परन्तु मेरे स्वर्गीय माता-पिता धन्य हैं जिन्होंने मुझे दो वर्ष के लिये उज्जैन भेजा जहां से 1974 में मैनें 60ः अंको से एम.एस-सी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। शायद उस समय मैं अपनी तहसील का पहला लड़का था, जो जिले के बाहर 250 कि.मी. दूर उज्जैन पढ़ने गया।


उज्जैन में पहली बार मैं छात्रावास में रहा जो एक नया अनुभव था। उस युग में लगभग 200 प्रतिमाह में उज्जैन में मेरा खर्चा चल जाता था। पिताजी प्रतिमाह मनीआर्डर से पैसे भेजते थे, करीब-करीब छात्रावास में सभी के पैसे मनीआर्डर से ही आते थे। जब पोस्टमेन हाॅस्टल में आता था तो छात्रों की भीड़ लग जाती थी। एम.एस.सी. में भी अंग्रेजी माध्यम से कष्ट हुआ परन्तु धीरे-धीरे परेशानी कम होती गई। एम.एस.सी. के दौरान तो मैंने रटकर डिपार्टमेंट के कार्यक्रमों में दो-तीन बार अंग्रेजी में भाषण भी दे डाले, इससे प्रोफेसरों की निगाह में मैं एक अच्छा छात्र बन गया। एम.एस-सी. में मेरे शिक्षक थे डाॅ0 हरस्वरूप, डाॅ. बी.एम. सिन्हा, डाॅ. जे. बहादुर व डाॅ. जोहरी जो अब सभी स्वर्गवासी हो गये हैं। एम.एस-सी. फाईनल में हमारी कक्षा का शैक्षणिक टूर श्रीनगर गया था, जो मेरे जीवन में टूर का पहला अनुभव था। लगभग तीन या चार दिन श्रीनगर रुककर हमने आसपास के स्थान, गुलमर्ग, टंगमर्ग, खिलनमर्ग, डलझील व वहां के बागों का भ्रमण किया था। उस समय कश्मीर में आतंकवाद जैसी कोई चीज नहीं थी, सेब रु. 5 प्रतिकिलो थे, अतः रोटी कम सेब ज्यादा खाते थे। एम.एस-सी. करते ही सिर्फ एक आवेदन पर राजस्थान में वरिष्ठ अध्यापक जीवविज्ञान के पद पर नियुक्ति मिल गई, सिर्फ शर्त थी कि बी.एड़ करते ही आपको स्थाई कर दिया जायेगा। वेतन मिलता था लगभग रु. 400 प्रतिमाह।


अभी तक मैं एक अनट्रेण्ड शिक्षक था। अतः दो साल नौकरी की व कुछ पैसा जोड़ा तथा उसके बाद 1975 में जैन शिक्षा महाविद्यालय मन्दसौर से बी.एड़ व अगले ही वर्ष देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर से एम.एड़ की परीक्षा पास की। इन्दौर में एम.एड़ करते हुए मैंने अनुभव किया कि अध्यापक शिक्षा भी अपने आप में एक स्वतंत्र विषय है। एम.एड़ में मेरे शिक्षक थे डाॅ. कटियार, डाॅ. भागीया, डाॅ. भोरास्कर व डाॅ. उमराव सिंह चैधरी। मैंने विद्यार्थी जीवन में केन्द्रीय विद्यालयों की तड़क-भड़क के बारे में बहुत सुना था, अतः मन से अच्छा थी कि शिक्षक की नौकरी करना तो केन्द्रीय विद्यालय की ही करना। अतः 1976 में जब एम.एड़ का विद्यार्थी था तभी केन्द्रीय विद्यालय का विज्ञापन निकला, आवेदन किया, फिर साक्षात्कार हुआ व दो माह बाद नियुक्ति पत्र भी मिल गया। परन्तु नियुक्ति मिली केन्द्रीय विद्यालय बोकारो जिला धनबाद (झारखण्ड) तो पांव के नीचे से जमीन खिसकने लगी। माता-पिता दुःखी हो गये पर मेरे बड़े भाई श्री विश्वनाथ कौशिक ने हौसला बढ़ाया व मैं एक पेटी व एक बिस्तर लेकर बोकारो पहुंच गया, जैसा सुना था केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी होता है, बड़े-बड़े घरों के बच्चे होते हैं, बड़े-बड़े कक्ष पुस्तकालय, लायब्रेरी, खेल के मैदान, बोकारो जाकर सभी पाया जो सुना था।


बोकारो झारिया बोल्टबेल्ट क्षेत्र में है जहां स्टील प्लांट हैं तीन सेक्शन वाला स्कूल, विशाल भवन। बोकारो के बाद मैंने जमालपुर (मुंगेर) महू, नीमच व सारणी केन्द्रीय विद्यालयों में जीवन के लगभग 15 वर्ष बिताये। केन्द्रीय विद्यालयों की व्यवस्थाओं से मैं बहुत प्रभावित हुआ। प्रशासकीय व स्थानीय दखल न के बराबर होने से यहां प्राचार्य को बहुत स्वायत्त हैं। नियमित कक्षाएं लगना यहां का सबसे अच्छा गुण है। पर्याप्त शिक्षक, अनुशासनपूर्ण वातावरण, स्मार्ट यूनिफार्म आदि ने मुझे बहुत प्रभावित किया। शिक्षकों व छात्र-छात्राओं के लिये समय की पाबन्दी अनिवार्य है। यहां प्रति सप्ताह होने वाली अन्तर सदनीय प्रतियागिताएं विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास में बहुत योगदान देती हैं। ’’शिक्षा के है तीन सोपान, कक्षा, मंच और मैदान’’ की उक्ति यहां शत-प्रतिशत चरितार्थ होती है।


इसी बीच नाम के आगे डाॅक्टर लगाने की तीव्र इच्छा से सन् 1988 में इन्दौर विश्वविद्यालय से डाॅ. उमराव सिंह चैधरी के मार्गदर्शन में मैंने शिक्षा संकाय में पी.एच-डी. की डिग्री भी प्राप्त की। फिर सन् 1990 में प्राचार्य बनने की तमन्ना पैदा हुई, उसी समय देश में नवोदय विद्यालयों का सृजन हो रहा था, अतः आवेदन किया व तुरन्त चयन भी हो गया। उस समय ये विद्यालय प्रारंभिक अवस्था में थे। स्थाई भवन नहीं थे, स्कूल किसी पुरानी सरकारी बिल्डिंग में प्रारंभ किए गए। ऐसे भवनों में कक्षाओं के साथ-साथ छात्रावास व भोजनालय की भी व्यवस्था करनी होती थी, जो कठिन कार्य था। प्रारंभ में इन स्कूलों में प्रतिनियुक्ति पर प्राचार्य व शिक्षकों को लिया गया, जिनके पास पहले से अच्छा अनुभव था। विद्यार्थी भी अधिकतर ग्रामीण क्षेत्र के होने से वे अधिक सुविधाओं की भी मांग नहीं करते थे, जो मिला उसी से संतुष्ट हो जाते थे।
शासकीय सेवा पूरी करने के बाद मैंने कुछ वर्ष निजी शिक्षा महाविद्यालयों में यह सोचकर कार्य किया कि यहां मेरी शिक्षा में पी.एच-डी. डिग्री का कुछ उपयोग हो जायेगा तथा सोचा पहले मैं अध्यापक था अब मुझे अध्यापक निर्माण का अवसर मिलेगा, परन्तु वहां की स्थिति देखकर रोना आ गया। निजी शिक्षा महाविद्यालयों के संचालकों, एन.सी.टी.ई. व विश्वविद्यालयों की मिलीभगत ने इस पवित्र व्यवसाय को दूषित कर दिया है। न तो कक्षाएं लगती हैं, न प्रेक्टिस टीचिंग, सिर्फ डिग्रियां बांटी जा रही हैं, जिसका असर शिक्षकों की गुणवत्ता पर पड़ रहा है, पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की किसी को फिक्र नहीं, सभी जेब भरने में लगे हुए हैं, जिसका खामियाजा भुगतेगी हमारी आने वाली पीढ़ियां।


खैर यह मेरी व्यथा थी जिसे उजागर करना मेरा शिक्षकीय धर्म है। पीछे मुड़कर अतीत को देखता हूं तो मेरे जीवन में कुछ अहम मोड़ आये। मुझ जैसे गरीब व ग्रामीण छात्र का उज्जैन जाकर एम.एस-सी. करना अति कठिन कार्य था, जिसके लिये मैं अपने स्वर्गवासी माता-पिता के सामने नतमस्तक हूं। दूसरा मोड़ था शिक्षा संकाय में एम.एड. व फिर पी.एच-डी. करना। इसके लिए मैं, मेरे शोध निर्देशक डाॅ. उमराव सिंह चैधरी का शुक्रगुजार हूं जिन्होंने मेरी सदा हौसला अफजाई की तभी मैं पी.एच.डी. कर सका। पी.एच-डी. डिग्री ने सरकारी नौकरी के बाद भी मेरी पहचान को बनाये रखा। अंतिम पंक्तियों में युवापीढ़ी से यही कहना चाहूंगा, चलते रहो, रास्ते आपने आप बनते जायेंगे। एक फिल्मी गाना भी है, ’’जीवन है चलने का नाम…’’

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