सपनों की जिंदगी को हकीकत में ढालने का दौर

-डॉ हरीश केशरवानी , मुख्य कार्यपालन अधिकारी, नौगाँव,मध्य प्रदेश

हर एक आम इंसान का सपना होता है कि उसके आसपास वह सारी सुविधाएं हो जो आसपास के लोगों के पास, परिवार, गांव व अन्य किसी भी क्षेत्र में होती है. जब मैं अपने बचपन के सपनों को याद करता हूं तो वो सारी चीजें अविस्मरणीय हो जाती हैं, या यह भी पाता हूं कि जहां से जिंदगी की शुरुआत की थी वह नवोदय ही था. जहाँ मैंने अपनी पहचान पाने की पहली सीढ़ी के रूप में शुरू किया था , वह नवोदय ही था जब मैंने गांव की गलियों से सपनों के दरवाजे की ओर बढ़ा, नवोदय ही है  कि जहां मैंने दुनिया और दुनियादारी जानने के लिए काबिल हुआ. नवोदय ने हमें नागरिक के रूप में भारतीय गणराज्य के विशालतम भू-भाग से परिचित कराया, हकीकत और व्यावहारिक पक्षों को सीखना और समझना सिखाया. सिखाया इसने संवेदनाओ को पढ़ने का एहसास, बताया कि कैसे तार्किकता की कसौटी से आगे कैसे बढ़ा जाए? यह बताया कि अपनों और सपनों को साधना में किस दायरे से गुजरना होगा.

शुरूआत तो नवोदय में हम सब के रूप में एक जैसी ही रही. सभी का अनुभव और दिनचर्या भी एक रही, घर की यादों में रोना, सुबह उठना, खाने की लाइन में लगाना, स्कूल जाना, खेलना, खाना और सोना. एक सामान्य दिनचर्या के बावजूद नवोदय ने सभी के जीवन को विशेष बनाया. उद्देश्यों को प्राप्त करने का रास्ता दिखाया. सोच और अवधारणाओं को व्यापकता दिलाया. चाहे नवोदय का कैंपस हो या वहां के स्टाफ या फिर चाहे दोस्तों की उस्तादियाँ; सबकी अपनी अविस्मरणीय यादें और कथाएं हैं. हर घटना आज भी मन में रोमांच जगाती है, बताती है कि हम मिट्टी से जुड़े ही रहेंगे सफलता की चाहे जहाँ की उड़ान भरें, जिंदगी के जिस मुकाम पर पहुंचे, परंतु अपनी हकीकत की पकड़ बनाए रखेंगे. नवोदय की सफलता की गाथा है कि भारत और विदेश मैं आज हर क्षेत्रों के विद्वान, कलाकार, लेखक, अभिनेता, खिलाड़ी, व्यवसायी, नवाचारी, उद्यमी, प्रशासक, वैज्ञानिक, साहित्यकार व कहें कि समाज में जिस किसी भी आयाम की आवश्यकता पड़ती है वह सभी व्यक्तित्व इस परंपरा में हमेशा ही मिलते हैं.

यह हकीकत है कि नवोदय विद्यालय ही हम सब को एक ऐसा रंगमंच दिया है जहां से हमने अपने अंदर छुपी प्रतिभा, क्षमता, बारीकी, विशेषज्ञता को निखारने का काम किया है. विद्यालय में एडमिशन के दौरान अजीब, बोरिंग और भारी लगने वाली जिंदगी कब इसके मोह में बंध जाती है पता ही नहीं चलता. शुरुआती दिनों में तो लगता है की जंजीरों में बंधी जिंदगी जो घर से दूर किसी अनजान घरोंदों में बंद कर दिया गया है. परंतु दोस्तों का आपस में भावनात्मक लगाव् मेल-जोल निश्चित और नियमित दिनचर्या आधारभूत सुविधाओं की उपलब्धता एक नन्हे बीज को विशालकाय फलदार वृक्ष में बदल देती है. कहने को तो यहां पर जब प्रवेश लेते हैं तब काफी बोझिल सा महसूस होता है लेकिन यही वह आदर्श समय होता है जो अपने सपने को अनमने दिल और दिमाग में उतारने में आगे बढ़ती है.

प्रतिकात्मक तस्वीर 

सुविधाओं और परंपराओं की कड़ियां इतनी मजबूत और सार्थक बनती जाती हैं कि हम एक नए सपने और हौसलों की ओर बढ़ते जाते हैं. यह भी हकीकत है कि जितनी तारतम्यता से हम बढ़ते जाते हैं उसी गति से मानसिक सुदृढ़ता भी प्राप्त करते हैं, ज्यों-ज्यों आगे की कक्षाओं में जाते हैं उसी के साथ आत्मविश्वास बढ़ता है. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है वैसे ही सपनों और सपनों को हौसलों को बड़ा करते जाते हैं. यहां न केवल शिक्षा मिलती है वरन हम व्यवहारिकता और संवेदनशीलता में भी मजबूती लाते हैं. परंपरा और प्रतिष्ठा के साथ अनुशासन की पाठशाला में गोता लगाते हैं. इन सभी चीजों का एहसास भले ही हमें उस दौर में ना समझ में आए वरन आज इसको बखूबी समझते हैं. भले ही सब अलग-अलग गांव व कस्बों से आते हो पर सभी की सोच, भाव, व्यवहार, विचार, यहां तक की खान-पान और दिनचर्या में एक हो जाते हैं.

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एडमिशन पश्चात जैसे जैसे कक्षाएं आगे बढ़ती हैं वैसे वैसे आत्मविश्वास को भी नया आयाम मिलता जाता है, व्यक्तित्व में निखार आता जाता है. वह तो सह-शिक्षा का ही प्रभाव है कि समाजीकरण के सभी पक्षों से भी जुड़े रहते हैं, आवासीय विद्यालय होने के कारण उत्सव, समारोह, त्यौहार, भावनाएं, संवेदनाएं भी बढ़ती जाती है. जिस प्रकार से नवोदय का लक्ष्य है ग्रामीण प्रतिभावान छात्रों को निखारना है, वह उसमें पूर्ण सफल हुआ है. इसके उद्देश्यों में शामिल क्षेत्रीय एकीकरण, राष्ट्रीय एकता और अखंडता की भावना भी चरितार्थ हुई है. यहहमें तब पता चलता है जब हम स्कूल से उत्तीर्ण होने के बाद बाहर की दुनिया से जुड़ते हैं. माइग्रेशन नीति का वास्तविक परिणाम हमें हमारी समझदारी के बाद ही समझ में आता है. भले ही स्कूल जीवन के दौरान यह बोझिल, डरावना और अप्रिय सा लगता हो परंतु स्कूल से पास होने के बाद इसके महत्व और प्रभाव को समझ पाते हैं. अब एहसास होता है कि राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक नवाचार के लिए या कितना महत्वपूर्ण पक्ष है साथ ही इस की यादों को जब टटोला जाता है तो लगता है कि जीवन का यह अद्भुत और अविस्मरणीय क्षण रहे हैं.

नादानी से आगे अपने परिपक्वता की समझ तब आती है जब हम कक्षा दसवीं की परीक्षा में बैठने को तैयार होते हैं. मन में अपने परिवार,  समाज और देश को लेकर कई तर्क और उलझनें प्रभावित करने लगती हैं. सामाजिक बदलाव का क्रांतिकारी विचार मन में आने लगता हैं. ऐसा लगता है मानो एक ही मौके में समाज की सारी कमियों को पूरा कर सकता हूं. कभी-कभी सरकार और प्रशासन के प्रति कई संकाय भी उभरती हैं. स्कूल में शिक्षा के साथ तर्क-वितर्क होने लगता है, परंतु यह दौर हमारे लिए और अधिक ऊर्जा एवं स्फूर्ति की पहचान दिलाता है. समय के साथ सारी भ्रांतियां दूर हो जाती है और हकीकत के प्रति हमारा नजरिया बदलने लगता है. यही वह दौर होता है जब लगता है कि सारी व्यवस्थाएं मेरे अनुसार हो, सिस्टम को मैं अपने हिसाब से आगे बढ़ाऊ, परंतु इस बात से अभी भी अनजान रहते हैं की दुनिया वह नहीं जहां हम रहते हैं; दुनिया तो वह है जब हम यहां से पढ़ाई करके निकलेंगे और प्रतियोगिता तथा प्रतिद्वंद्विता के कगार में संघर्ष की शुरुआत करेंगे.

यह पता ही नहीं चलता कि एक अबोध, नादान और नासमझ के बचपन वाले जीवन से कब आगे आकर किशोरावस्था और क्रांतिकारी विचारों की अवस्था तक पहुंच गए यह सात साल की जिंदगी हमारे चरित्र को संभाला, हम अपनी पहचान स्थापित करने के लिए योग्य बने और हमारे अंदर की काबिलियत समाज को व् देश को दिशा देने के लिए एक नया आकार दिया. यह पता ही नहीं चला कि अपनी फिकर ना करने की आदत और घर की भरपूर याद के साथ समय का पहिया इतनी रफ्तार से घूमा कि अब नवोदय के आखिरी क्षणों से सामना हो रहा है. आज भी शैक्षणिक भवन के सामने लिखा वाक्य “शिक्षार्थ आइए सेवार्थ जाइए” का इतना गहरा और व्यापक अर्थ है कि उसका ऋण किसी भी कीमत पर नहीं चुकाया जा सकता इसी मायने में नवोदय विद्यालय का मूल वाक्य “प्रज्ञान ब्रह्म” में इतनी ताकत है कि हम समाज को नई दिशा देने के काबिल हो जाते हैं ऐसा लगता है कि सात साल की जिंदगी एक सपनों का हसीन संसार था. जहां हम अपने दोस्तों के साथ शिक्षकों के आगोश में हकीकत की दुनिया से सामना करने के लिए डाले गए. खाना, खेलना, सोना, पढ़ना, चंचलता, विचार, उपलब्धि, यह सब हमारे उसी सात साल का परिणाम है जहां के सांचे में हमें डाला गया.

अभिव्यक्ति की पराकाष्ठा इस बात से कभी नहीं की जा सकती परंतु अपनी संवेदनाओं को शब्दों के माध्यम से निश्चित ही बताया जा सकता है. कभी-कभी यह लगता है कि नवोदय की वही दिनचर्या और भी बनाए रखें. शायद स्कूल के पलों के लिए, अपनों से जुड़े रहने के लिए यही बस काफी है कि नवोदय का स्थान मेरे जीवन में वही है जो सपनों की जिंदगी को हकीकत में ढालने का काम किया. शब्दों की डोर में मैं यही कहना चाहूंगा कि “तेरी जय नवोदय”.

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