गुलाम गुलाब पर समाजफोबिया नामक संक्रमण (कहानी )

– हेमंत कुमार

अंजली कन्वेंट स्कूल से अपनी हाई स्कूल पास करने के बाद अपने इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए खुद से लड़ती है। उसकी यह लड़ाई अपने एकेडमी परफॉर्मेंस के लिए नहीं है। अपितु इस महान पराक्रमी  पितृसत्तात्मक समाज में अपने पिता के प्रति श्रद्धा समर्पित अंजलि के उस विचार से है, जो उम्र के इस पड़ाव में क्रांति करने को प्रेरित कर रही है। अंजलि सीबीएसई में 85%  अंक से पास हुई है, तो उसके आंतरिक मनोभाव मे उत्साह के नोक पर सत्ता परिवर्तन को जी मचलता है।

               बहुत सोचने समझने के बाद ‘गुलाम गुलाब’ अंजलि हिम्मत करती है और अपने सपनों को चुनती है। यहां सपने भी गुलामी के चाशनी में डुबोए गए है डॉक्टर या शिक्षक। दुनिया के इस आधी आबादी को दाद देना होगा कि समाज नामक क्रांतिवीर द्वारा सभी प्रोफेशंस को हड़प लिये जाने के बावजूद ये वीरांगनाएं अपनी समर्पण और करुणा से लबरेज दो प्रोफैशंस में एकछत्र राज कर रही हैं। दुनिया की यह आधी आबादी सैकड़ों प्रोफैशंस में से मात्र दो ही में बंध कर रह गई है। यह कोई साधारण बात नहीं हैं।

                खैर छोड़िए, हम आते हैं अंजलि पर। अब  सामाजिक मुआवजे की कैरियर को ही उठाना है तो यह वीरांगना कमी क्यों करें? इसलिए शिक्षक के बजाय डॉक्टर बनने के सपने में लगती है। उसने स्मार्ट दुनिया और डिजिटल इंडिया में सोशल मीडिया के जाल में फंसने वाली मछलियों का शिकार होते देखा है। इसी वजह से उसने वीरों की भूमि सोशल मीडिया को बॉयकट कर जीना सीख लिया है। उसे तो बस अब अपने एक सहेली के दिल्ली से आने का इंतजार है, जो गर्मी की छुट्टी में आएगी।

             उससे सब कुछ पता करने के बाद अंजलि अपने परम पूजनीय पिता के समक्ष इस प्रस्ताव को रखती है। पिताजी के लिए यह प्रस्ताव थोड़ा भारी लगता है, तुरंत उनके ख्याल में समाज आता है। आम आदमी के जीवन में सब कुछ निर्धारण करने वाला यह समाज हर समय, हर पल अपने मर्यादा के बोझ ढोने वाले पिता को ‘लोगवा का कहीं’ का परम मंत्र देता है। तस्लीमा नसरीन के ‘लज्जा’ और आमीर खान के ‘सत्यमेव जयते’ प्रोग्राम के एंटीडॉट्स इस वायरस को कुछ हद तक प्रभावित करते हैं। परंतु पिता के सामाजफोबिया की बीमारी भी तो इतनी भयानक हैं कि इसके लक्षण को पकड़ना साक्षात एड्स की दवा खोजने जैसा है। और होगा क्यों नहीं? एड्स और समाजफोबिया, इन दोनों बीमारियों में समरूपता भी तो है। एक हमारे शरीर को तो दूसरा हमारे समाज को दीमक की तरह खोखला कर देता है । एक शरीर को रोगों से लड़ने के लायक नहीं छोड़ता है, तो दूसरा मानसिक तौर पर इतना कमजोर कर देता है कि हम समाज के कुरीतियों लड़ नहीं पाते हैं।
                  समाजफोबिया नामक संक्रमण रोग से संक्रमित संसार के पारिवारिक सिरमौर पिता पहले  मानते तो नहीं है। फिर भी अंजली के कई बार आग्रह करने पर उनके टीवी और अखबारों में छपने के लालसा को एक पंख लगता प्रतीत होता है। इंटरमीडिएट के साथ शुरू हुआ जंग, आज रिजल्ट के साथ अंजली जीत लेती है। इन 2 सालों के अथक संघर्ष के बाद पिता को विकल्पहीन करके अंजली बाजी मार लेती है। अब इस सामाजफोबिया से संक्रमित पिता के दिल के एक कोने में खुशी है लेकिन भारी पलड़ा तो परम शक्तिमान समाज का ही है। अब एक साल के अनुदान के साथ अंजली देश के दिल दिल्ली में आकाश छूने को तैयार है। बागी क्रांतिवीर वीरांगना राजधानी जाकर जी तोड़ मेहनत करती है। कोचिंग के टेस्ट में उतार चढ़ाव के बाद अंजली का एआईपीएमटी का परिणाम आता है। अंजलि कुछ नंबरों से रह जाती है। वीरों की भूमि में हारने वालों की कोई औकात नहीं होती है। तभी तो यह समाज ‘वीर भोगे वसुंधरा’ के महामंत्र को चरितार्थ करता है। अब पापा के आदेश पर अंजलि घर आती है। समाजफोबिया के साथ-साथ आर्थिक चोट का दर्द सिर्फ एक पिता ही जान सकता है।

                  इसी बीच अंजलि के साथ ही पढ़ने वाले धर्मवीर के पिता कर्मवीर जी अपने इंटर फेल पुत्र के लिए पुत्रवधू के तलाश में अंजली के घर आते हैं। ऐसे सेठ जिसके सिर पर साक्षात लक्ष्मी सवार हो, उसके यहां अंजली का रिश्ता करना अंजली के पिता के लिए सपने जैसा है। अपनी पूरी कमाई गिरवी रख कर भी अंजलि के पिता को यह परम सौभाग्य जैसा लगता है। परंतु उम्र और कानून का अनुपालन भी तो एक मजबूरी है। ‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी’ सही कहा गया है, और इस उक्ति को चरितार्थ करते हुए अंजली मौके पर चौका लगाती है। मेडिकल के कट-ऑफ के आधार पर एक प्रतिष्ठित कृषि विश्वविद्यालय में बैचलर की पढ़ाई के लिए दाखिला ले लेती है।

पिता जहां भी जिक्र करते हैं लोग खूब बड़ाई करते हैं लेकिन शुभचिंतक बैचलर के बाद तुरंत B.Ed करने का स्पष्ट और अकाट्य सलाह देते है। इससे अलग अंजलि को कृषि वैज्ञानिक बनना है, परंतु उच्च शिक्षा के सपने की लड़ाई में इतना दम नहीं, जितना इंटरमीडिएट के बाद मेडिकल की तैयारी के लिए किया था। हाई स्कूल से अब तक पूरे 7 साल लड़ने के बाद अब संक्रमित पिता और परिवार की जिम्मेदारी के लिए समर्पित अंजली अपने सपनों को कुर्बान करके एक बागी तेवर वाली सुशील और आज्ञाकारी बेटी के रूप में एक कीर्तिमान स्थापित करने को मजबूर हैं।

                  इस प्रकार से अंजलि के सपनों का सफर डॉक्टर, वैज्ञानिक से होते हुए शिक्षक पर आकर पितृसत्तात्मक समाज में आदर्श बेटी का  कीर्तिमान स्थापित कर पिता के मूछों का शान बन जाता है। अंजली का बीएड कंप्लीट होने वाला है, लंबी जंग में सब कुछ हार कर भी जीतने जैसा प्रतीत हो रहा है। अंजली की यह आभासी जीत वास्तव में उसके पिता की जीत है। लेकिन इस  जीत में भी पिता को उसके खोट ने क्रोधित कर दिया। जब अंजली ने विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान दोस्ती से प्रेम में परिणत अपने और देव के रिश्तें को पेश करती है।

                      देव बहुत होनहार रिसर्च स्कॉलर है। शायद अंजलि के कृषि वैज्ञानिक के सपने का हीरो भी, जो ‘नया गुलाब’ उगाये। एक ऐसा गुलाब जो गुलाम न हो। परंतु सीता-राम और शिव-पार्वती के परम पुजारी समाज के डर से उसके पिता अमरीश पूरी बनने को बाध्य थे।

                        उधर देव के पिता से भी यह घोर अनर्थ सहा नहीं गया। इसी बात पर देव जैसे सैनिक को पिता की मिलिट्री कोर्ट ने कोर्ट मार्शल कर दिया। क्रोध के प्रतिमूर्ति पिता परशुराम रूपेण हो गए और बात पिता के थप्पड़ के साथ खत्म हुई। देव भी तो आखिर इसी समाज का हिस्सा है, सो जोरू का गुलाम और प्रेम प्रसंग में डूबे इस मर्दाना को पिता के प्रवचनों से अपने शक्ति का आभास होता है। नल और नील के कुल का यह वैज्ञानिक अपने और अंजली के बीच बने रामसेतु को तोड़कर एक ऊंचा बागी चीन का दीवार खड़ा कर लेता है।

                          बेचारी अंजली रो कर भी क्या करें? इस बात का ज्ञान अब उसे भी हो गया है कि दुनिया के बाजार में प्रेम और विवाह दोनों टांगे होते हैं। प्रेम तो सिर्फ प्रदर्शन और मोल की वस्तु हैं, अंतः बिकना तो विवाह को ही है। यहां भावना और प्रेम भी अब दहेज और पैसों से परास्त है। अंजलि को इस विवाह में कोई विशेष रूचि नहीं है। विवाह के साथ ही ‘गुलाम गुलाब’ को आजाद करने का उसका सपना भी बिखड़ गया है।

                     आज अंजलि के घर पर लड़के वाले आए हैं। लड़का सेक्रेटरिएट में बड़ा बाबू है। लड़के के जन्म से पढ़ाई-लिखाई से अब तक के सभी खर्च का ब्योरा लड़के के पिता अंजली के पिता को बड़े प्रेम और सहजता के साथ ठठाके के बीच बातों ही बातों में बता देते हैं। इतने बड़े अधिकारी दमाद का अधिकार भी तो बड़ा होगा। अंजलि अब अपना सब कुछ हार कर, अपने घर परिवार से माता पिता से दूर जाकर भी इस अधिकारी की अच्छी जीवन-संगिनी बने भी तो आखिर क्या मोल ? सो अंजली के पिता अधिकारी दमाद के अधिकार की भरपाई करने के लिए अपना घर गिरवी रखते हैं और दहेज से अपने भार अंजलि को बेचने के बजाय विवाह कर देते हैं।

                      मायके से ससुराल तक अंजली गुलाम नहीं है क्योंकि उसके पास अपना कुछ कहने को इतने बड़े समाज के संस्कारों एवं अनंत मर्यादाओं का जिम्मेवारी है। तब वह पिता के मूंछ की रक्षक थी, अब पति परमेश्वर के मर्यादा की रक्षक है। ‘लोगवा का कहीं’ के मंत्र को अंजलि सीखने लगी है तभी तो अंजली अभी भी अंजली है,  कल्पना चावला और  उड़नपरी पी. टी. उषा नहीं। वह जननी है, विष्णु जैसे सृष्टिकर्ता की साक्षात एजेंट है, प्यारी है, करुणामई है, अंजलि गुलाब है पर अभी गुलाम है।

One thought on “गुलाम गुलाब पर समाजफोबिया नामक संक्रमण (कहानी )

  1. This is a nice story……realy
    Navodayans height.ne yeh ek achchhi pahal chalayi h…………….so so blessed
    Jai Navodaya

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