छत्रपति संभाजी महाराज(इतिहास)

-कवि अनूप कुमार नवोदयन

दरअसल, भारत के इतिहास को फिर से लिखे जाने की आवश्यकता है, क्योंकि वर्तमान में पाठ्यपुस्तकों में जो इतिहास पढ़ाया जाता है वह या तो अधूरा है या वह सत्य से बहुत दूर है। ऐसा प्रतीत होता है कि इतिहास मात्र विदेशी आक्रान्ताओं को खुश करने के लिए लिखा गया है। दरअसल, इतिहास जैसा है उसे वैसा ही प्रकट किया जाना चाहिए।      

                जिस राष्ट्र के लोग अपने इतिहास को अच्छे से नहीं जानते या जिस राष्ट्र के लोग अपने इतिहास को लेकर भ्रम की स्थिति में रहते हैं उनमें कभी भी अपने राष्ट्र के प्रति वैसे भक्ति नहीं रहेगी, जैसी होना चाहिए। उस राष्ट्र में मतभेद इस स्तर पर बढ़ते हैं कि वे मनभेद और हिंसा तक फैल जाते हैं। जिस राजनीतिज्ञ को अपने राष्ट्र के समाज और इतिहास की अच्छे से जानकारी नहीं होगी तो स्वाभाविक रूप से ही वह समाज में प्रचलित धारणा या अफवाह को ही सच मानकर कार्य करेगा जिससे समाज में असंतोष ही फैलेगा।

         भारत पिछले सैंकड़ों सालों से गुलाम और दीनहीन रहा इसके बारे में अब लोग जानना नहीं चाहते कि गुलामी के काल में क्या क्या हुआ जिसके परिणाम हम आज तक झेल रहे हैं। यह सही है कि अतीत के बुरे वक्त को भुलकर नए भविष्य को गढ़ना चाहिए लेकिन यह भी उतना ही सही है कि जो लोग अतीत से सीख नहीं लेते वह अपना भविष्य बिगाड़ लेते हैं

इतिहास के उन्हें पन्नों को कुरेदते हुए आज एक भारतीय योद्धा की कहानी आप तक पहुॅचाने का प्रयास कर रहा हॅूं जिसने औरंगजेब जैसे कट्टर और निर्दयी शासक को पहले तो कई यु़द्धों में अपनी वीरता का एहसास कराया और फिर उसकी अधीनता ना स्वीकार करते हुए तमाम यातनाएं सहते हुए मात्र 31 वर्ष की अल्पायु में ही अपना बलिदान कर दिया।

छत्रपति संभाजी महाराज

संभाजी राजे का जन्म 14 मई 1657 को पुरंदर किले पर हुआ. ये पुणे से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर है. वो शिवाजी महाराज की पहली और प्रिय पत्नी सईबाई के बेटे थे. वो महज दो साल के थे जब उनकी मां की मौत हो गई, जिसके चलते उनकी परवरिश उनकी दादी जिजाबाई ने की।

  संभाजी महाराज कितने बुद्धिमान थे इस बात का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हो मात्र 13 साल की उम्र में तेरह भाषाएं सीख गए थे। उन्होंने अपने उम्र के केवल 14 साल में उन्होंने बुधभूषणम , नखशिखांत , नायिकाभेद तथा सातशातक यह तीन संस्कृत ग्रंथ लिखे थे। संभाजी महाराज संस्कृत के ,महान ज्ञानी थे ।

उन्होने कई शास्त्र भी लिख डाले घुड़सवारी , तीरंदाजी , तलवारबाजी यह सब तो मानो जैसे इनके बाएं हाथ का खेल था। छत्रपति संभाजी नौ वर्ष की अवस्था में पुण्यश्लोक छत्रपती श्री छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रसिद्ध आगरा यात्रा में वे साथ गये थे। औरंगजेब के बंदीगृह से निकल, पुण्यश्लोक छत्रपती श्री छत्रपति शिवाजी महाराज के महाराष्ट्र वापस लौटने पर, मुगलों से समझौते के फलस्वरूप, संभाजी मुगल सम्राट् द्वारा राजा के पद तथा पंचहजारी मंसब से विभूषित हुए। उनको यह नौकरी मान्य नहीं थी। किन्तु हिन्दवी स्वराज्य स्थापना की शुरू के दिन होने के कारण और पिता पुण्यश्लोक छत्रपती श्री शिवाजी महाराज के आदेश के पालन हेतु केवल 9 साल के उम्र में ही इतना जिम्मेदारी का लेकिन अपमान जनक कार्य उन्होंने धीरज से किया।

   स्वभावतः संवेदनशील रहनेवाले संभाजी राजे उनके पिता शिवाजी महाराज जी के आज्ञा अनुसार मुगलों को जा मिले ताकी वे उन्हे गुमराह कर सके, क्योंकि उसी समय मराठा सेना दक्षिण दिशा के दिग्विजय से लौटी थी और उन्हे फिर से जोश में आने के लिये समय चाहिये था। इसलीये मुगलों को गुमराह करणे के लिये पुण्यश्लोक छत्रपती श्री शिवाजी महाराज जी ने ही उन्हे भेजा था। बाद में छत्रपती श्री शिवाजी महाराज जी ने हि उन्हे मुगलों से मुक्त किया।

छत्रपति संभाजी महाराज राज्याभिषेक

    छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु के बाद, एक शोक का पर्वत उन पर और स्वराज पर टूट पड़ा। लेकिन इस स्थिति में, संभाजी महाराज ने स्वराज्य की जिम्मेदारी संभाली। कुछ लोगों ने धर्मवीर छत्रपती श्री संभाजी महाराज के अनुज राजाराम को सिंहासनासीन करने का प्रयत्न किया। किन्तु सेनापति हंबीरराव मोहिते के रहते यह नाकामयाब हुआ । 16 जनवरी 1681 को संभाजी महाराज का विधिवत राज्याभिषेक हुआ। उन्होंने अन्नाजी दत्तो और मोरोपंत पेशवा को उदार हृदय से क्षमा कर दिया और उन्हें अष्टप्रधान मंडल में रखा। हालांकि, कुछ समय बाद, अन्नाजी दत्तो और मंत्रियो ने फिर से संभाजी राजे के खिलाफ साजिश रची और राजाराम को राज्याभिषेक के लिए योजना की । संभाजीराजे ने स्वराज्यद्रोही अन्नाजी दत्तो और उनके सहयोगियों को हाथी के पाव के नीचे मार डाला ।

औरंगजेब का महाराष्ट्र पर आक्रमण

  शिवाजी महाराज के निधन के बाद, मुगल सम्राट औरंगजेब स्वयं स्वराज्य ख़त्म करने के लिए महाराष्ट्र में आया । औरंगजेब ने 1682 में स्वराज पर हमला किया। औरंगजेब 5 लाख की सेना लेकर महाराष्ट्र में आया ।5 लाख सेना, 14 करोड़ का खज़ाना, 40 हज़ार हाथी, 70,000 घोड़े, 35 हज़ार ऊँट। इतना विशाल समुद्र तट था कि औरंगजेब का शिविर 3 मील तक फैला हुआ था। औरंगजेब की ताकत संभाजी राजे की तुलना में सभी मामलों में अधिक थी । औरंगजेब की मुग़ल सेना स्वराज की सेना से पांच गुना से अधिक थी, और उसका राज्य स्वराज्य से कम से कम 15 गुना अधिक था। औरंगजेब की सेना दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना में शामिल थी। संभाजी महाराज के नेतृत्व में, मराठों ने बहुत बहादुरी के साथ लड़ाई लड़ी और एक भी किला औरंगजेब जीतने नहीं दिया । औरंगजेब २७ साल महाराष्ट्र में रहा लेकिन उसको मराठों को राज्य जीतने में सफलता प्राप्त नहीं हुई । यही कारण था कि उत्तर में अनेक हिन्दू राज्य का उदय हुआ ।

गोवा के पुर्तगालीयो के खिलाफ युद्ध

 गोवा के पुर्तगालियों को समझाने के बाद उन्होंने औरंगजेब की मदद करने की भी कोशिश की। तब संभाजी महाराज को खुद गोवा का रुख करना पड़ा। गोवा में पिछले कई शताब्दी से पुर्तगालियों का शासन था। उन्होंने पणजी शहर के चारों ओर एक मजबूत किले का निर्माण किया।

संभाजी महाराज, उनकी घुड़सवार सेना, पैदल सेना, पूरी सेना आ गई थी, पुर्तगालियों को पराजित करने के लिए। अब तक, वाइसराय ने केवल संभाजी महाराज की शक्तिशाली कहानियों के बारे में सुना था, वह भयभीत था, वह डर गया था। उसने तुरंत अपने सैनिकों को पीछे हटने का आदेश दिया। पुर्तगाली सेना भी इस आदेश की प्रतीक्षा कर रही थी, और जब आदेश प्राप्त हो जाता, तो वह पीछे की ओर भाग गए । किले पर स्थित मराठे इस दृश्य को देखकर बहुत खुश हुये ।मराठों का आक्रमण इतना जबरदस्त था कि गोवा के वाइसराय को अपनी राजधानी को पणजी से मारमा गोवा में स्थानांतरित करना पड़ा।

 गोवा में बहुत से लोग कई वर्षों तक पुर्तगालियों के अत्याचार, यातना और अत्याचार से पीड़ित थे। कई सालों के बाद, वे आज स्वतंत्रता का आनंद ले रहे थे। संभाजी महाराज ने कुछ हिंदू धार्मिक लोगों को वापस ले लिया जो धर्म में ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गए थे ।

छत्रपति संभाजी महाराज की प्रमुख लड़ाईया

   संभाजी महाराज ने १२८ युद्ध लडे एक भी युद्ध में हार नहीं हुई, इस धर्म के रक्षक, स्वराज्य के रक्षक और शिवराज के शंभु छावा , छत्रपति संभाजी महाराज कहते है। छत्रपति शिवाजी की रक्षा नीति के अनुसार उनके राज्य का किला जीतने की लड़ाई लड़ने के लिए मुगलों को कम से कम एक वर्ष तक अवश्य जूझना पड़ता। औरंगजेब जानता था कि इस हिसाब से तो सभी किले जीतने में 360 वर्ष लग जाएंगे। उसी का एक उदहारण नासिक के पास रामशेज किले की लड़ाई हैै। औरंगजेब के कमांडरों को उम्मीद थी कि कुछ ही घंटों में किला आत्मसमर्पण कर देगा। लेकिन मराठों ने इतनी कड़ी लड़ाई का विरोध किया कि उन्हें इस किले को जीतने के लिए कुल छह साल तक संघर्ष करना पड़ा। संभाजी राजे ने इन शत्रुओं को गोवा के पुर्तगालियों, जंजिरेका का सिद्दी और चिक्कादेवराई को इतना कड़ा सबक सिखाया कि औरंगज़ेब को संभाजी महाराज के खिलाफ उनकी मदद करने की कोई हिम्मत नहीं हुई। संभाजी राजे इनमें से किसी भी दुश्मन को पूरी तरह से नष्ट करने में सक्षम थे। लेकिन उनमें से कोई भी उनके खिलाफ नहीं हो सका। संभाजी महाराज के नेतृत्व में, मराठा ने सभी दुश्मनों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उसने संभाजी महाराज से मुकाबला करने के लिए अपने पुत्र शाहजादे आजम को तय किया। आजम ने कोल्हापुर संभाग में संभाजी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उनकी तरफ से आजम का मुकाबला करने के लिए सेनापति हमीबीर राव मोहिते को भेजा गया। उन्होंने आजम की सेना को बुरी तरह से परास्त कर दिया. युद्ध में हार का मुंह देखने पर औरंगजेब इतना हताश हो गया कि बारह हजार घुड़सवारों से अपने साम्राज्य की रक्षा करने का दावा उसे खारिज करना पड़ा। संभाजी महाराज पर नियंत्रण के लिए उसने तीन लाख घुड़सवार और चार लाख पैदल सैनिकों की फौज लगा दी। लेकिन वीर मराठों और गुरिल्ला युद्ध के कारण मुगल सेना हर बार विफल होती गई। औरंगजेब ने बार-बार पराजय के बाद भी संभाजी से महाराज से युद्ध जारी रखा।

दक्खन आक्रमण दक्षिणी प्रांत के राजा चिक्कदेव पर आक्रमण

संभाजी राजे ने मैसूर के राजा चिक्कदेव राजा के साथ सुलह करने की कोशिश की थी,।लेकिन चिक्कदेव ने मराठा के तीन शक्तिशाली सरदारों का वध कर दिया और श्रीरंगपट्टनम के द्वार पर उसका सिर लटका दिया।छत्रपति संभाजी महाराज ने औरंगजेब का स्वराज्य संकट की जिम्मेदारी सेनापति हमबीरराव मोहिते के ऊपर सौंपी। संभाजी राजा ने त्रिचनाचली में घेराबंदी की। एक बड़ा युद्ध का मैदान था। मराठा किले पर अग्नि बाण भी चलाते थे। अंत में किला मराठोंने जीत लिया। और चिक्कदेव राजा शरण में आया।

पानी पर तैरता पहला तोफखाना संभाजी महाराज ने ही बनाया

 शिवाजी महाराज ने सोचा था कि “भारत की स्वतंत्रता कायम रह सकती है, भारत की स्वतंत्रता की रक्षा समुद्र द्वारा ही की जा सकती है।” और इन्हीं विचारों का अनुसरण करते हुए, संभाजी महाराज ने 4 नए स्थानों में महाड, जैतापूर, कल्याण और राजापुर में नौसेना के केंद्र बनाया । पानी पर तैरता पहला तोफखाना संभाजी महाराज ने ही बनाया ।

धोखे से संभाजी महाराज को बन्दी बना लिया गया 

1 फरवरी 1689 की शुरुआत में, संभाजी महाराज ने अपने महत्वपूर्ण सरदारों को कोंकण में संगमेश्वर में बुलाया। बैठक पूरी करने के बाद संभाजीराजे रायगढ़ के लिए रवाना हो रहे थे, जिसके चलते छत्रपति संभाजी महाराज ने अपने साथ केवल 200 सैनिक रख के बाकि सेना को रायगढ भेज दिया। उसी वक्त उनके एक फितूर जिनको उन्होंने वतनदारी देने से इन्कार किया था गणोजी शिर्के , मुग़ल सरदार मुकरब खान के साथ गुप्त रास्ते से 5000 के फ़ौज के साथ वहां पहुंचे। यह वह रास्ता था जो सिर्फ मराठों को पता था। इसलिए संभाजी महाराज को कभी नहीं लगा था के शत्रु इस और से आ सकेगा। उन्होंने लड़ने का प्रयास किया किन्तु इतनी बड़ी फ़ौज के सामने 200 सैनिकों का प्रतिकार काम कर न पाया और अपने मित्र तथा सलाहकार कविकलश के साथ वह बंदी बना लिए गए।  11 मार्च 1689 हिन्दू नववर्ष दिन को दोनों के शरीर के टुकडे कर के औरंगजेब ने हत्या कर दी। किन्तु ऐसा कहते हैं कि हत्या पूर्व औरंगजेब ने छत्रपति संभाजी महाराज से कहा के मेरे 4 पुत्रों में से एक भी तुम्हारे जैसा होता तो सारा हिन्दुस्थान कब का मुग़ल सल्तनत में समाया होता। जब छत्रपति संभाजी महाराज के टुकडे तुलापुर की नदी में फेंकें गए तो उस किनारे रहने वाले लोगों ने वो इकठ्ठा कर के सिलकर जोड़ दिए (इन लोगों को आज ” शिवले पाटिल ” इस नाम से जाना जाता है) जिस के उपरांत उनका विधिपूर्वक अंत्य संस्कार उस गांव के पाटिल और मराठों ने किया। औरंगजेब ने सोचा था की मराठी साम्राज्य छत्रपति संभाजी महाराज के मृत्यु पश्चात ख़त्म हो जाएगा।लेकिन छत्रपति संभाजी महाराज के हत्या की वजह से सारे मराठा एक साथ आकर लड़ने लगे। अतः औरंगजेब को दक्खन में ही प्राणत्याग करना पड़ा। उसका दक्खन जीतने का सपना इसी भूमि में दफन हो गया। उन्हीं छत्रपति संभाजी महाराज  के नाम पर पर संभाजी नगर बसा था जिसें बाद में मुगलों ने औरंगाबाद कर दिया था। यह भारतीय इतिहास की विडम्बना ही है कि ऐसे भारतीय सूररवीरों से इतिहास को अछूता रखा गया है जिन्होंने अपने धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिये इतनी अमानवीय यातनाएं सहने के बाद अपना बलिदान दिया।

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