सामाजिक व आर्थिक विकास में शिक्षा की अहम् भूमिका

कृष्ण कुमार यादव,निदेशक डाक सेवाएँ,
लखनऊ

भारतीय संस्कृति का एक सूत्र वाक्य है-‘तमसो मा ज्योतिर्गमय।‘ अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने की इस प्रक्रिया में शिक्षा का बहुत बड़ा योगदान है। भारतीय परम्परा में शिक्षा को शरीर, मन और आत्मा के विकास द्वारा मुक्ति का साधन माना गया है। शिक्षा मानव को उस सोपान पर ले जाती है जहाँ वह अपने समग्र व्यक्तित्व का विकास कर सकता है। इस समग्र व्यक्तित्व विकास में सिर्फ भौतिक परिलब्धियाँ ही नहीं बल्कि शारीरिक व मानसिक विकास के साथ-साथ बौद्धिक परिमार्जन, सांस्कृतिक चेतना एवं नैतिक व सामाजिक मूल्यों का उन्नयन भी महत्वपूर्ण है। स्वामी विवेकानंद के शब्द यहाँ याद आते हैं-‘‘वास्तव में सभी प्रकार की शिक्षा और अभ्यास का उद्देश्य ‘मनुष्य निर्माण‘ ही होना चाहिए। सारे प्रशिक्षणों का अंतिम ध्येय मनुष्य का विकास करना ही है। जिस अभ्यास से मनुष्य की इच्छाशक्ति का प्रवाह और प्रकाश संयमित होकर फलदायी बन सके, उसी का नाम है शिक्षा।‘‘
स्पष्ट है शिक्षा आजीवन चलने वाली मनुष्य के परिष्कार का साधन है। वेदांतों में तो यहाँ तक लिखा गया है कि-‘‘समस्त ज्ञान हमारे अंदर ही विद्यमान है। एक शिशु में भी है, केवल उसे जागृत करना है। शिशु में ‘ज्ञान‘ का जागृत होना ही शिक्षा कहलाती है।” ‘शिक्षा‘ शब्द संस्कृत भाषा के ‘शिक्षाविद्योपादाने‘ से निष्पन्न है, जिसका अर्थ है- ‘विद्या का उपादान।‘ ‘उप‘ माने ‘समीप‘ एवं ‘आदान‘ माने ‘ग्रहण‘ अर्थात किसी के समीप जाकर विद्या ग्रहण करना। इसी परिभाषा के अनुसार प्राचीन काल में गुरुकुल परंपरा थी, जहाँ राजा व रंक दोनों एक साथ गुरु के सान्निध्य में शिक्षा ग्रहण करते थे। इस शिक्षा से जहाँ घर एवं परिवार के प्रति आसक्ति दूर होती थी, वहीं समभाव भी पैदा होता था। यह शिक्षा मात्र किताबी नहीं थी बल्कि इसमें आचरण, नैतिक मूल्य, संस्कार, बौद्धिक परिमार्जन, भावनात्मक विकास, शारीरिक स्वास्थ्य एवं प्रकृति व अन्य प्राणियों का साहचर्य शामिल था। हमारी प्राचीन गुरुकुल की शिक्षा व्यवस्था अनमोल और शाश्वत है। यह हमें आज भी सही दिशा में बढ़ने की प्रेरणा देती है और हमारा मार्गदर्शन करती है। यह शिक्षा विद्यार्थियों को चहरदीवारियों में कैद नहीं रखती, बल्कि उनमें अंतर्निहित संभावनाओं को अनंत विस्तार देती है। पाश्चात्य दार्शनिक काण्ट के शब्द गौरतलब हंै-‘‘शिक्षा व्यक्ति की उस पूर्णता का विकास है, जिस पर वह पहुँच सकता है।‘‘
शिक्षा का यह परंपरागत रुप लंबे समय तक चला पर अंग्रेजी शासन व्यवस्था ने इसमें अपने स्वार्थों की पूर्ति हेतु आमूल-चूल परिवर्तन किए। शिक्षा की मैकाले नीति ने पूरा ढर्रा ही बदल दिया। वर्तमान दौर में देखें तो वाकई चीजें काफी हद तक परिवर्तित हो चुकी हंै। यथार्थ के धरातल पर आज शिक्षा की कसौटी ही बदल गई है। सतत् चलने वाली प्रक्रिया की बजाय शिक्षा को स्कूल-काॅलेजों की चहरदीवारियों में कैद कर दिया गया है। शिक्षा का एक मात्र उद्देश्य अच्छा कैरियर बनाना हो गया है। पढ़ाई में कोई कितना भी निपुण हो, परंतु बिना अच्छे कैरियर के उसका कोई मोल नहीं रह गया। कभी साहचर्य और समन्वय शिक्षा के अभिन्न अंग थे, पर अब तो इसने विद्यार्थियों को आपस में ही प्रतिस्पर्धी बना दिया है। किताबी कीड़े बनाती शिक्षा की कसौटी पास या फेल होने तक रह गई है। कभी कोई फेल होने की आशंका में आत्महत्या कर रहा है तो कोई कम अंक पाने पर। आई0आई0टी0 जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में हर साल बढ़ती प्रतिस्पर्धा एवं तनाव न झेल पाने के कारण न जाने कितने विद्यार्थी मौत को गले लगा लेते हैं। आत्मोन्नति पर भौतिक उपलब्धियाँ और पदोन्नति हावी है। बहुत पहले इस ओर इंगित करते हुए स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि-“हम देखते हैं कि सर्वोच्च बौद्धिक शिक्षा प्राप्त किये हुये लोगों में कई अधार्मिक पुरुष हुये हैं। पाश्चात्य सभ्यता की बुराइयों में से यह भी एक है कि यहाँ हृदय की परवाह न करते हुये केवल बौद्धिक शिक्षा दी जाती है। ऐसी शिक्षा मनुष्य को दस गुना अधिक स्वार्थी बना देती है।“ ऐसे में इस शिक्षा की व्यावहारिकता पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है।
महात्मा गाँधी ने कहा था कि-“जिस शिक्षा का असर हमारे चरित्र पर नहीं होता, वह कुछ काम की नहीं होती।“ पर शिक्षा का सीधा संबंध आज रोजगार से जुड़ गया है। ऐसे में प्रतिस्पर्धा बढ़ना लाजिमी भी है। इस प्रतिस्पर्धा की आड़ में शिक्षा में कुकुरमुत्तों की तरह फैलते काॅलेजों एवं कोचिंग संस्थाओं ने अच्छा-खासा आर्थिक साम्राज्य खड़ा कर लिया है। यहाँ शिक्षा की बकायदा कीमत वसूल की जाती है, ऐसे में अभिभावकों एवं विद्यार्थियों पर दबाव पड़ना स्वाभाविक है। उच्च शिक्षा पर जी0डी0पी0 का एक प्रतिशत भी नहीं खर्च किया जा रहा है, जिसे अच्छा-खासा बढ़ाने की जरुरत है। भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला देश है। आज हम व्यापक भूमंडलीकरण तथा गहन प्रतिस्पर्धा के कठिन दौर से गुजर रहे हैं। विज्ञान व प्रौद्योगिकी का तेज गति से विस्तार हो रहा है। यह क्षेत्र लगातार अंतर आयामी, बहुआयामी और बहुद्देशीय होता जा रहा है। भारत के पास उन बड़ी शक्तियों में शामिल होने की पूरी क्षमता है, जिनकी 21वीं सदी में प्रमुख भूमिका होगी। ऐसे में सारी दुनिया भारत की युवा शक्ति पर टकटकी लगाए हुए हैं। अगर इन युवाओं को सही ढंग से तराशा और संवारा जाए तो वे राष्ट्रीय गौरव का एक नया इतिहास रच सकते हैं। युवा वर्ग अपनी मेघा, परिश्रम और लगन से सबको चमत्कृत कर सकते हैं और युवा शक्ति भारत को विश्व का मुकुटमणि बना सकती है। इसीलिए यह आवश्यक है कि युवाओं के व्यक्तित्व का निर्माण हमारी प्राथमिकता में शामिल हो। ऐसे में शिक्षण संस्थाएं, युवाओं के मस्तिष्क के लिए नए क्षितिजों के द्वार खोलने और उन्हें आज के जीवन संदर्भांे की चुनौतियों का सफलतापूर्वक मुकाबला करने के लिए तैयार करती हैं।
भारतीय संदर्भ में बात करें तो यहाँ ब्रेन-ड्रेन अर्थात प्रतिभा पलायन एक महत्वूपर्ण समस्या है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत से अमेरिका जाने वाली प्रतिभाओं के कारण भारत को 700 मिलियन डाॅलर की राजस्व हानि होती है, जो कि भारत की कुल आय का 12 फीसदी बनता है। स्पष्ट है कि सारी क्रीम विदेशों की तरफ जा रही है। प्रत्येक 10 में से 4 साफ्टवेयर विशेषज्ञ अमेरिका में कार्य कर रहे हैं। यही नहीं आज अमेरिका में 38 फीसदी डाॅक्टर और 12 फीसदी वैज्ञानिक भारतीय हैं। अमेरिकी स्पेस एजंेसी ‘नासा’ में 36 फीसदी वैज्ञानिक और इंजीनियर भारतीय हैं तो ‘माइक्रोसाॅफ्ट’ कम्पनी के 34 फीसदी तकनीकी विशेषज्ञ और ‘इंटेल’ कम्पनी में 20 फीसदी इंजीनियर भारतीय हैं। वहीं दूसरी तरफ भारत में टेक्नाॅलाजी व वित्तीय सेवाओं से जुड़ी कंपनियों की शिकायत है कि उनके पास यदि 10 स्नातक नौकरी के लिए आते हैं, तो मात्र 3 ही अनिवार्य कुशलता पूरी करने योग्य होते हैं। प्रमुख उद्योग संगठन एसोचैम की एक रिपोर्ट की मानें तो देश में हर वर्ष दो लाख एमबीए, छः लाख से ज्यादा इंजीनियरिंग स्नातक निकलते हैं, लेकिन इनमें से एक चैथाई ही नौकरी के योग्य होते हैं। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 90 फीसदी स्नातक नौकरी पाने योग्य नहीं होते। इसका कारण है कि जहाँ आइटी, सेवा, मानव संसाधन, बीमा जैसे क्षेत्रों में 90 फीसदी नौकरियाँ व्यावसायिक एवं प्रबंधकीय रूप से दक्ष लोगों के लिए है, वहीं देश की कार्यशील आबादी के महज छः फीसदी को ही व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त हो पाती है। इसके विपरीत दक्षिण कोरिया के 96 फीसदी, जापान के 80 फीसदी व जर्मनी के 75 फीसदी कामगारों को व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त होती है। ऐसे में उच्च शिक्षा के आयाम बढ़ाने के साथ-साथ प्रतिभा-पलायन रोकना भी एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
बदलाव प्रकृति का नियम है और शिक्षा भी इससे अछूती नहीं रही। आज शिक्षा अपने परंपरागत स्वरुप से हटकर ‘ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था‘ की ओर अग्रसर है। शिक्षा और रोजगार में अनन्य संबंध एवं तद्नुसार उन्नत मानव संसाधनों के साथ विकास दर की उँचाइयों को छूना इसका ध्येय है। जैसे-जैसे सेवा क्षेत्र का विस्तार हो रहा है, वैसे-वैसे तमाम नए उद्यम भी सामने आ रहे हैं। इनके लिए दक्ष मानव संसाधन की आवश्यकता है और साथ ही इस काम के लिए इन्हें विशेष कौशल प्रशिक्षण देने की भी आवश्यकता है। इसमें कोई शक नहीं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र होने के साथ-साथ सबसे बड़ा बाजार भी मुहैया कराता है। ऐसे में शिक्षा को उत्पादन से जोड़ वांछित, सार्थक और लाभदायक योगदान की अपेक्षा की जा रही है। एक तरफ शिक्षा संस्थाओं में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा एवं गुणवत्ता बनाने हेतु विदेशी विश्वविद्यालयों को बुलाने की योजना चल रही ह,ै वहीं इग्नू जैसी संस्थाएं देश के कोने-कोने में दूरस्थ शिक्षा को आसान कर रही हंै। ई-शिक्षा ने भी इस संबंध में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आज हमारे पास वर्चुअल लैब और प्रौद्योगिकी संपन्न केंद्र है जिनके जरिए न केवल शिक्षा पहुँचाई जा सकती है बल्कि दक्षता उन्नयन कार्यक्रम और तकनीकि प्रशिक्षण मुहैया की जा सकती है। यह इसलिए जरुरी है क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में काॅलेज खोलना और इनके लिए बुनियादी संरचना का विकास करना संभव नहीं है।

प्रतिकात्मक चित्र 


गौरतलब है कि शिक्षा-साहित्य-संस्कृति की त्रिवेणी ही किसी राष्ट्र को उन्नत बनाती है। शिक्षा को उत्पादकता से जोड़कर देखना गलत नहीं है बशर्तें परिवार, परिवेश, पर्यावरण और संस्कृति से इसे विरत् न किया जाय। पारिवारिक मूल्यों के प्रति निष्ठा, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की जानकारी, पर्यावरण के प्रति सचेतना, आध्यात्मिक पुरुषों, स्वतंत्रता सेनानियों एवं राष्ट्रीय वीर पुरुषों के जीवन व आदर्शों के बारे में प्रेरणात्मक पहलू जैसे तमाम तत्वों के बिना शिक्षा का उद्देश्य अधूरा है। 2020 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का सपना देखने वाले पूर्व राष्ट्रपति एवं वैज्ञानिक ए0 पी0 जे0 अब्दुल कलाम ने बहुत खूबसूरत शब्दों में लिखा कि-“जब हृदय में शुद्धता हो/तो चरित्र में सुन्दरता आ जाती है/यदि चरित्र सुंदर हो तो/ परिवार में समरसता होती है।“ राज्यसभा की शिक्षा संबंधी याचिका समिति द्वारा वर्ष 2009 में प्रस्तुत वक्तव्य गौरतलब है-“विज्ञान-सम्मत स्वास्थ्य-शिक्षा, नैतिक शिक्षा, व्यक्तित्व विकास एवं चरित्र निर्माण, पर्यावरण के प्रति जागरुकता हेतु उचित एवं आयु विशिष्ट पाठ्यक्रम तैयार किया जाए।“
शिक्षा का स्वरुप कुछ भी हो, पर सब के लिए शिक्षा बेहद जरुरी है। सामाजिक व आर्थिक विकास में शिक्षा की अहम् भूमिका है। शिक्षा व्यक्ति के भौतिक और नैतिक दोनों प्रकार के विकास का आधार तैयार करती है। यह हमारी संवेदनाओं और अवधारणाओं को परिष्कृत बनाती है, जिससे मन-मस्तिष्क को स्वतंत्रता और उनके बीच तालमेल स्थापित करती है और वैज्ञानिक दृष्टि के विकास में सहायता मिलती है। शिक्षा ज्ञान, बुद्धि और कौशल को समृद्ध बनाती है। प्राथमिक स्तर पर स्कूलों में संसाधनांेे व अध्यापकों की सुनिश्चितता, उच्च स्तर पर ज्ञान में प्रवीणता हासिल करने के साथ-साथ नए विचारों व सिद्धान्तों का उद्भव एवं व्यावहारिक जीवन में उनका समसामयिक प्रयोग भी अपेक्षित है। तमाम नियम-कानूनों के बावजूद परीक्षाओं में धांधली, विद्यार्थियों का शोषण एवं जातिवादी राजनीति से शैक्षणिक परिसरों की मुक्ति ही अंततः भारत को एक सुखी-समृद्ध-शिक्षित राष्ट्र बना सकेगा। भारतीय परिप्रेक्ष्य में प्रथम राष्ट्रपति डाॅ0 राजेन्द्र प्रसाद के शब्द आज भी प्रासंगिक हैं-“भारत को अपने लिये ऐसी संस्कृति तथा शिक्षा का चयन करना होगा जो कि प्राचीन संस्कृति की उŸामता से प्रेरित हो एवं इसके साथ ही साथ वर्तमान माँगों की भी उपेक्षा न कर सके।“

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