पुलवामा के आतंकी हमले में शहीद मानिंदर सिंह को श्रद्धांजलि !

-NH Desk, New Delhi

देश हर दिन की तरह उस दिन भी अपने कामों में व्यस्त था। कोई दफ्तर के कार्यों का निष्पादन कर रहा था, तो कोई अपने खेतों में अपने अन्नदाता होने का फर्ज अदा कर रहा था। कुछ लोग वैलेंटाइन डे मना कर अपने प्यार का इजहार कर रहे थे। व्हाट्सएप और सोशल मीडिया पर सेंट वेलेंटाइन के प्यार और मानवता के पैगाम के किस्से दोहराए जा रहे थे, लेकिन यह ज्यादा देर तक नहीं चल सका। उन्हीं किस्सों-कहानियों के बीच अचानक एक खबर भी दौड़ने लगी ‘पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों पर आतंकी हमला’। जो लोग जाहिल होते हैं उनके पास दिन, इंसानियत और संवेदना का कद्र नहीं होता। हमले के बाद पूरे देश के में सब कुछ ठहर सा गया अगली सुबह तक शहीदों के नाम और संख्या भी सामने आ गया। 42 नामों में एक नाम था मनिंदर सिंह अत्री का।


              पंजाब के गुरदासपुर जिले के दीनानगर की गलियों से अपने ख्वाबों के बस्ते को लेकर मनिंदर ने जब जवाहर नवोदय विद्यालय में पहुंचा, और फिर मिला उसे एक नया परिवार। उसी परिवार ने गांव की गलियों से बस्ते में समेट कर लाए हुए, उसके ख्वाबों को नई उड़ान भरने की ताकत दी। बचपन से ही होनहार मनिंदर ने क्लासरूम से लेकर खेल के मैदान तक अपना झंडा गाड़े रखा। नवोदय विद्यालय से पास आउट होने के बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करना शुरू किया। लेकिन सरदारों वाले खून ने देश की रक्षा की ऐसी आग मन में जगाई कि इंजीनियर मनिंदर ने सेना में जाने का फैसला किया। शुरुआती प्रयासों में ही वह सीआरपीएफ में सिपाही के पद पर भर्ती हो गया। जीवन में हमेशा नए मोड़ और नए मुकाम मिलते रहते हैं,  लेकिन इंसान ना कभी मोड़ो पर थक कर बैठा है और ना ही मुकाम की चाहत छोड़ी है। मनिंदर के लिए भी यह सफलता तो मात्र दरवाजा खुलने जैसा था अभी तो पूरी चढ़ाई बाकी थी। 
              पिछले दिनों मीडिया से बात करते हुए उनके बहन ने बताया कि शादी की बात कहने पर वह यह कह कर टाल देते थे कि अभी प्रमोशन हो जाए तब इसके बारे में सोचेंगे। लेकिन कौन जानता था कि सेना का बड़ा अधिकारी बनने की हसरत रखने वाले भारत मां के इस 27 वर्षीय लाल को, जिहाद के नाम पर इंसानियत को शर्मसार करने वाले शैतानों के कायराना हमले में जान गंवाना पड़ेगा। गांव के लोग हो या सहकर्मी या फिर बचपन के दिनों में खेले और पढ़े साथी सबकी आंखें नम है। वैसे तो इन जवानों की याद में पूरे देश की आंखें नम हैं। ये नम आंखें खामोशियों में ही बहुत कुछ बयां कर जाती है। ये आँखें पूछ लेती हैं टीवी पर झलकियां देने वाले उन नेताओं से यह सवाल कि हमारे बीच का यह बेटा या भाई क्यों शहीद हो गया? दिल में अधिकारी बनने का सपना रखने वाला एक जवान आखिर क्यों मुट्ठी भर जाहिल लोगों के घटिया सोच का शिकार हो गया? देश के सभी शहीदों को सलाम।

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