किस्सा: खेत, चक, नाली की नाप तथा आय निर्धारण दोनों मामलों में पूरी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन की आवश्यकता

प्रदीप सारंग

पारदर्शिता के लिए बनाए गए सूचना अधिकार अधिनियम को सरकारी मशीनरी ने खिलवाड़ बनाकर रख दिया है। शायद ही कोई सूचना, पहली बार माँगने पर निश्चित अवधि में प्राप्त कराई जाती हो। अधिकांश को राज्य आयोग तक दौड़ना ही पड़ता है। सरकारें भी उन्हीं की सुन और समझ रही हैं जिन पर सूचनाएं देने के दायित्व हैं।
वर्ष 2005 में कांग्रेस की सरकार ने जब इस कानून को पारित किया था तब इसे स्थानीय सत्ता की मनमानी के खिलाफ कारगर हथियार के रूप में जनता को सौंपा गया था तथा आजादी के बाद के सबसे बड़े जन-अधिकार के रूप में पहचान कराई गई थी। बड़े ही उमंग और आशाजनक कानून के रूप में जनता के हाथ में आया और जागरूकता के अभियान चलाए गए। जब लोग जागरूक हुए तो उन्हें सूचनाएं न देने हेतु अंदर खाने अभियान भी चलाये गए। रोड़े अटकाने सम्बन्धी अघोषित उपक्रम भी रचे गए।
परिणामस्वरूप सूचना अधिकार का प्रयोग करने वाला व्यक्ति, सम्बंधित अधिकारी कर्मचारी का विरोधी मान लिया जाता है। और फिर शुरू हो जाता है आँख-मिचौली का खेल। यानी सूचनाएं देने और माँगने वाले के बीच दाँव-पेच। एक फन्दे डालता है दूसरा फन्दे काटता है। बस यही रह गयी है सूचना अधिकार अधिनियम की कहानी। जिस मंशा से सूचनाएं देने की व्यवस्था बनाई गयी है उसको लगभग लोग त्याग चुके हैं।
ऊपरोक्त व्यथा-कथा के बतौर अनेक प्रकरण हमारे आस-पास मिल जाएंगे किन्तु एक ऐसा उदाहरण भी है जिसे राज्य आयोग से भी सूचनाएं तो नहीं मिलीं किन्तु पारदर्शिता की राह के बड़े और घने अंधकार की पहचान कराने में तथा नई बहस खड़ी करने में जरूर कामयाब हुए।
ये उदाहरण बने हैं जनपद बाराबंकी के ग्राम कमरावां निवासी किसान जगतपाल वर्मा जो कि भाजपा के मौजूदा बूथ अध्यक्ष भी हैं। इन्होंने वर्ष 2018 में मार्च माह की 28 तारीख को एक जन-सूचना अपनी तहसील नवाबगंज के जन-सूचनाधिकारी/उपजिलाधिकारी से माँगी कि इनके खेत चक संख्या 39 की चारों मेड़ों की नाप अलग-अलग बताई जाए। इसके साथ ही बंदोबस्ती क्षेत्रफल तथा नक्शानुसार क्षेत्रफल बताए जाने जैसे कुल 5 सवाल पूछे। इन्होंने पोस्टल आर्डर भी लगाया। 10 अप्रैल 2018 को इन्हें दस्ती तौर पर एक कागज तहसील कर्मचारी द्वारा प्राप्त कराया जाता है जिसमें किसी सवाल का उत्तर न देकर घुमाव दार तरीके से खाना पूरी किए जाने का टोटका किया गया। माँगी गयी सूचना और उपलब्ध कराए गए उत्तर निम्नवत रहे-
प्रश्न 1- प्रार्थी के चक संख्या 39 का बंदोबस्ती क्षेत्रफल कितना है?
उत्तर- बंदोबस्ती क्षेत्रफल प्रार्थी अभिलेखागार से प्राप्त कर सकते हैं।
प्रश्न 2- प्रार्थी के चक संख्या 39 का नक्शानुसार क्षेत्रफल कितना है?
उत्तर- अभिलेखों में दर्ज नहीं है अतः सूचना देय नहीं है।
प्रश्न 3- नक्शाअनुसार क्षेत्रफल कैसे निकाला जाएगा?
उत्तर- नक्शाअनुसार क्षेत्रफल प्रार्थी उ0 प्र0 रा0 सं0 की धारा 24 के अंतर्गत पैमाइश करवाकर निकाल सकता है।
प्रश्न 4- जिस तरीके से नक्शाअनुसार क्षेत्रफल ज्ञात किया जाता है वह तरीका भी बताएं?
उत्तर- नक्शाअनुसार क्षेत्रफल अभिलेखों में अंकित नहीं है, खेतौनी अनुसार अंकित है प्रार्थी खेतौनी तहसील से निर्धारित शुल्क जमा कर प्राप्त कर सकता है।
प्रश्न 5- प्रार्थी के चक 39 की चारों मेड़ों की नाप अलग अलग बताएं?
उत्तर- अभिलेखों में दर्ज नहीं अतः सूचना देय नहीं।

इसप्रकार जगतपाल को कोई सूचना नहीं दी गयी और जगतपाल ने मजबूर होकर जिलाधिकारी के पटल पर 25 अप्रैल 2018 को बाद में राज्य आयोग व राष्ट्रीय आयोग का दरवाजा खटखटाया। किन्तु राज्य सूचना आयोग भी वास्तविक सूचनाएं दिलाने में नाकामयाब रहा। पत्रावली में जरूर अंकित हुआ कि सूचनाएं प्राप्त करा दी गईं हैं। जो सूचनाएं उपलब्ध कराई गई है आप सब पढ़ चुके हैं।
ये है कहानी सूचना अधिकार अधिनियम में हो रहे खेल की। जिसमें पूरी की व्यवस्था का फोकस फ़ाइल वर्क पर है न कि सूचना उपलब्ध कराने पर।
जगतपाल की संघर्ष गाथा से एक मुद्दा सबकी नजर में आया कि यदि किसानों को अपने प्रत्येक चक की चारों मेड़ों की नाप लिखित रूप से दे दी जाए तो खेत मेड़ को लेकर होने वाले मौके के विवादों में काफी कमी के साथ ही शिकायती प्रार्थनापत्रों से लेकर अदालतों में मुकदमों में भी कमी आ सकती है। प्रायः खेत मेड़ की सीमा विवाद में खूनी संघर्ष होते रहते हैं इन संघर्षों के पीछे सिर्फ स्पष्ट नीति और नियम का न होना है।
उक्त समस्याओं से परेशान किसान जगतपाल का कहना है कि खेतौनी में एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिसमें प्रत्येक चक की चारों मेड़ों की नाप, चकमार्ग व नाली की चौड़ाई का उल्लेख स्पष्ट तौर पर हो। जिससे कम पढ़ा लिखा किसान भी अपनी खेतौनी किसी से पढ़वाकर स्थिति को समझ सके।
लेखपाल जैसे महत्वपूर्ण कर्मचारी व इनकी अस्पष्ट कार्यविधि से प्रायः नए नए विवाद उपन्न होते रहते हैं जबकि यह बात भी दीगर है कि लेखपाल ही किसी जमीनी विवाद को मौके पर सुलझाने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। इसीप्रकार आय गणना के मामले में भी बिल्कुल स्पस्ट नीति न होने अथवा जवाबदेही स्पस्ट न होने पर लेखपाल को बहुतेरी मनमानी करने के अवसर प्राप्त होते हैं।
खेत, चक, नाली की नाप तथा आय निर्धारण दोनों मामलों में पूरी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है। जब भी सरकार का ध्यान इधर जाएगा सचमुच बहुतेरी समस्याओं से आम किसान को निजात मिल जाएगी।

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