हिंदी दिवस

NH DESK, JHARKHAND

भारतेंदु हरिश्चंद्र अपनी एक कविता के शुरुआती दो पंक्तियों में लिखते हैं
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।
और उनकी ये दो पंक्तियां इंगित करती है कि भाषा जीवन के सबसे महत्वपूर्ण इकाइयों में से एक है।
हिंदी भारत की पहली और एकमात्र भाषा है जिसमे बाकी स्थानीय से लेकर वैश्विक भाषाओं का इतना शानदार समावेश है कि लोग हिंदी में बात करते हुवे कभी समझ नही पाते कि इनमें कौनसा शब्द उर्दू है,कौनसा अरबी और कौनसा विलायती।

हिंदी का यही समावेशी व्यवहार इसे नित्य-व्यवहार्य बनाता है।चाहे देश की किसी भी भूभाग में आप चले जाइये ,हिंदी बोलना सम्भव है कि न आये लेकिन समझना सबको आता है।हिंदी की यह स्वीकार्यता इसीलिए है क्योंकि हिंदी ने सबको स्वीकार किया है।
हिंदी कई रूपों में हमतक पहुँचती है।

कभी एकदम क्लिष्ट होकर साहित्यिक चासनी में लिपटी होती है तो कभी दफ़्तरी काम-काज के भारी भरकम असाधारण शब्दो के साथ।कभी हिंदी एकदम सपाट होकर हमारे कानो में गूंजती है तो कभी एकदम ठेठ अंदाज में क्षेत्र-विशेष के विशेष व्यंजनाओं के साथ।हिंदी को कभी किसी विशेष शब्द -विशेष तौरतरीके में नही बांधा गया और इसीलिए यह शब्दो की गंगा अविरल होकर सदियों से नही कालों से हिंदुस्तान में बहती आ रही है।

बिहार के ठेठ देशज भावभंगिमा के बोली जाने वाली भाषा भी हिंदी है और बंगाल के “ओ कार” वाले अंदाज में बोली जाने वाली भाषा भी हिंदी,किसी विलायती के उसके फ्रेंच-रसियन अंदाज में तूती फूटी हिंदी भी हिंदी है और मध्यप्रदेश के एकदम शालीन तरीको से बोली जाने वाली भाषा भी हिंदी।
हिंदी दिवस पर हिंदी को हमे कुछ नहीं देना है बल्कि हिंदी से जितना संभव है हमे लेना है क्योंकि शब्दो की गंगा को हम क्या ही दे सकते हैं??
©जितेंद्र भगतिया

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